अपनी मंजिल और रास्तों के लिए हम खुद होते हैं जिम्मेदार

एक दादा अपने पोते को जीवन का ज्ञान दे रहे थे। उन्होंने बताया कि मेरे अंदर एक युद्ध चल रहा है। उनकी बात सुनकर पोता थोड़ा सा घबरा गया। पोते को परेशान देख दादा ने उसे तसल्ली दी और कहानी को आगे जारी रखा। उन्होंने कहा कि यह युद्ध दो भेडि़यों के बीच हो रहा है। एक भेडि़या दुष्ट है, वह डर, गुस्से, जलन, दुख, लालच और झूठ का प्रतीक है। जबकि दूसरा भेडि़या खुशी, शांति, प्रेम, मेल-जोल, दया और सच्चाई का प्रतीक है।

अब तक युद्ध से डर रहा पोता अब असमंजस में था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह कैसा युद्ध है। दादा पोते के मन के भाव समझ रहे थे, मगर उन्होंने अपनी कहानी को जरी रखा। उन्होंने कहा कि यही युद्ध तुम्हारे अंदर भी चल रहा है। अब पोते का सिर चकराने लगा, उसे लगा कि दादा बेकार में उसे परेशान कर रहे हैं।

उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। ये कैसी कहानी है, ये कैसा युद्ध है और यह जो युद्ध दादा के अंदर चल रहा है वो उसके अंदर कैसे आ सकता है। उसने दादा से पूछा कि इस लड़ाई में जीत किसकी हुई। दादाजी ने कहा कि तुम जिसे खिलाओगे उसकी जीत होगी। दादा ने पोते का चेहरा देखा और समझ गए बेचारा बच्चा बिलकुल परेशान हो गया है।

फिर उन्होंने पोते को अपनी गोद में बिठाया और कहा कि हम अपने आसपास अगर नकारात्मक सोच वाले लोगों से घिरे रहेंगे तो हमारे भीतर भी नकारात्मक बातें भरती जाएंगी। इसका मतलब यह हुआ कि हम दुष्ट भेडि़या को भोजन परोस रहे हैं। इसके विपरीत अगर हम अच्छी सोच वाले लोगों के साथ रहेंगे, अच्छी किताबे पढ़ेंगे और लोगों की मदद करेंगे, तो हम अच्छाई को प्रेरित करेंगे। यह हमें तय करना है कि हम कैसे जीना चाहते हैं। अच्छे लोगों का साथ हमें तरक्की के रास्ते पर ले जाएगा और बुरे लोगों का साथ हमें बुराई की ओर ले जाएगा।