अपने लक्ष्य के साथ रुचियों को भी दें समय

हमारे देश में मुंह, गले के कैंसर के मामले दुनिया में सबसे ज्यादा हैं। हमारे समाज का एक बड़ा तबका तंबाकू से बने नशीले पदार्थों का सेवन करता है।

एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल लगभग पचास हजार मामले गले के कैंसर से जुड़े होते हैं, जिनमें से लगभग पांच हजार लोगों का कैंसर चौथी स्टेज पर होता है। ऐसी स्थिति में डॉक्टरों को उनका वॉइस बॉक्स निकालना पड़ता है।

मरीज बोल नहीं पाते। बाजार में महंगे कृत्रिम अंग होने से ज्यादातर मरीज इन्हें खरीदते नहीं हैं। ऐसे लाखों लोगों की उम्मीद बने हैं डॉ. विशाल राव। उन्होंने आवाज गंवा चुके लाखों लोगों के लिए ओम् नाम का कृत्रिम अंग बनाया है, जो सिर्फ 50 रुपये का है। यह उपकरण गले की सर्जरी के बाद मरीजों को फिर से बोलने में मदद करता है। वह अपना ज्यादातर समय आवाज गंवा चुके मरीजों के इलाज में बिताते हैं।

कैसे हुए प्रेरित
डॉ. विशाल राव बैंगलुरु से हैं। वह जब स्कूल में थे, तब उनकी महत्वाकांक्षा चिकित्सा क्षेत्र में जाने की बजाय कुछ और ही बनने में थी। वह कल्पना में भी खुद को डॉक्टर के रूप में नहीं देखते थे।

वह एक ऑटोमोबाइल इंजीनियर या फिर बाइकर बनने के सपने देखते थे। लेकिन, उनके माता-पिता चाहते थे कि वह चिकित्सा क्षेत्र में जाएं। उन्होंने बायोलॉजी की परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त किए थे। उनके माता-पिता ने उन्हें अपना निर्णय बदलने और चिकित्सा की पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। हालांकि, मेडिसिन की पढ़ाई के दौरान भी उन्होंने ऑटोमोबाइल में अपनी रुचि को बनाए रखा। वह तिमाही परीक्षाओं के दौरान भी इंजन की अंदरूनी संरचनाओं को समझने में समय बिताते। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह कैंसर के मरीजों के इलाज में लग गए। कैंसर से जुड़ी कई चिकित्सा पद्धतियों के विशेषज्ञ बने। वह मरीजों को देखने के अलावा सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा भी लेने लगे। खासतौर से तंबाकू सेवन जैसी बुरी आदत को लेकर जागरूकता बढ़ाने में आगे रहे। वह तंबाकू मुक्त दुनिया बनाने का सपना देखते हैं।

एक बार सर्जरी के बाद एक कैंसर का मरीज उनके पास आया। वह अपने मित्र शशांक महेश के साथ बैठे थे। वह एक उद्यमी थे। उस मरीज की शिकायत थी कि वह दोबारा कैसे बोल सकता है। जबकि बाजार में मौजूद महंगे ध्वनि यंत्र खरीदने के लिए उसके पास पैसे नहीं है। जब डॉ. विशाल अपने दोस्त से इस मरीज की मदद की बात कर रहे थे, तब उनके मित्र ने कहा कि क्यों न वे दोनों मिल कर आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए सस्ता और बढि़या कृत्रिम वॉइस बॉक्स बनाएं।

दोनों दोस्त मिल कर इसे बनाने में लग गए। आखिर ओम् नाम का यंत्र बन कर तैयार हुआ, जो मरीज की भोजन नली को वॉइस बॉक्स में बदल कर उन्हें बोलने में मदद करता है। वह कहते हैं कि उन्होंने इसका आविष्कार बाजार को ध्यान में रख कर नहीं किया है। अब तक वह अपने इस यंत्र के जरिये हजारों कैंसर मरीजों को उनकी आवाज लौटा चुके हैं। फीचर डेस्क

काम की बात
जब हमारे भीतर महत्वाकांक्षा और मकसद एक साथ हो जाते हैं, तब हम बदलते हैं। सपने देखें और फिर आगे बढ़ कर कुछ करें। इस दौरान अपनी रुचियों के लिए भी समय निकालें।

गुरु मंत्र
मैंने हमेशा किसी व्यक्ति की बेहतरी के लिए ही आविष्कार करने पर यकीन किया है। मैं बाजार को ध्यान में रख कर न सोचता हूं, न करता हूं।