ईश्वर के सच्चे रूप हैं माता-पिता, कौन चुका पाया उनका ऋण

एक महानगर में एक मध्यवर्गीय परिवार रहता था। गृहस्वामी शर्माजी, उनकी सुंदर-सुसंस्कृत पत्नी, दो कॉलेज जाते बच्चे और शर्माजी के बूढ़े माता-पिता, जिनकी उम्र 80 को पार कर रही थी। शर्माजी दिन-रात पुत्र-पुत्री और पत्नी की इच्छाओं को पूरा करने में जुटे रहते। किंतु वृद्ध माता-पिता की देखभाल करने में उन्हें बहुत झुंझलाहट होती। उनके पिता को डायबिटीज थी और मां के घुटने गठिया के कारण जबाब दे रहे थे। हर हफ्ते-दो हफ्ते शर्माजी को उन्हें डॉक्टर के पास ले जाना पड़ता। उन्हें लगने लगा था कि माता-पिता के साथ रहने से उनके मनोरंजन और दोस्तों के यहां आने-जाने में विघ्न पडऩे लगा है। तमाम सुख-सुविधाएं होते हुए भी शर्माजी को जीवन बोझिल लगने लगा। एक दिन दफ्तर में अचानक उनका कॉलेज का एक दोस्त आया। शर्माजी बहुत गर्मजोशी से मित्र से मिले। वर्षों पुरानी यादें तरोताजा हो गईं।

शाम के पांच बजे मित्र ने अपने घर जाने का आग्रह किया। पर शर्माजी का मन अभी भरा नहीं था, उन्होंने उसे रोकते हुए कहा, ‘इतनी जल्दी भी क्या है/ डिनर के बाद चले जाना पर मित्र तैयार न हुआ, बोला, ‘दो सप्ताह पहले ही मां की हार्ट सर्जरी हुई है, मुझे उनकी देखभाल करनी है। जाना होगा। यह सुन शर्माजी को लगा कि उनका मित्र और वह एक ही नाव में सवार हैं। इधर पिता की डायबिटीज, मां की गठिया, उधर दोस्त की मां की हार्ट सर्जरी! दोनों का ही जीवन बूढ़े माता-पिता के चलते अपना न था। वह मित्र से पूछ ही बैठे, ‘माता-पिता की देखभाल करते-करते तुम्हें जीवन बड़ा नीरस और बोझिल लगने लगा होगा।

यह सुन मित्र मुस्कुराया और शर्माजी के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला, ‘मित्र, कैसी बात करते हो! इस उम्र में भी मेरे सिर पर माता-पिता के स्नेह की छतरी बनी हुई है, इस से बड़ी सौगात मेरे जीवन में क्या हो सकती है भला! उनके होते हुए ही तो मैं रिटायरमेंट की इस उम्र में भी बच्चा बना हुआ हूं! मित्र की बात सुन शर्माजी का सर लज्जा और ग्लानि से झुक गया। उनकी आंखें पश्चाताप के आंसुओं से नम हो गईं। वह सीधे घर पहुंचे, माता-पिता के कमरे में गए और उनसे लिपट गए। लगा जैसे बचपन लौट आया हो! माता-पिता का स्पर्श उन्हें अलौकिक अनुभूति दे गया।

क्या यह सच नहीं कि हमारे माता-पिता उम्र भर मोमबत्ती की तरह जलते-जलते सदैव हमारे जीवन में प्रकाश भरने की कोशिश करते हैं। तो क्या हम उनके जीवन के आखिरी दौर में भी उन्हें प्यार और मान-सम्मान नहीं दे सकते। सच तो यह है कि इस दैहिक लोक में माता-पिता ही परमात्मा के सच्चे रूप हैं। उनसे ही हमें जीवन मिलता है, वे ही हमारे प्रथम गुरु और सखा होते हैं और वही हमारा पालन-पोषण करते हैं। क्या हम इस जीवन में उनका ऋण किसी भी रूप में चुका सकते हैं।
ह्न डॉ. अनुराग अग्रवाल