एक साधक के जीवन में अहंकार सबसे बड़ा बाधक – साध्वी पदमहस्ता भारती

दादा देव मेला ग्राउंड, नज़दीक दादा देव मंदिर, द्वारका, सैक्टर-7, दिल्ली में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा आयोजित सात दिवसीय श्रीरामकथामृत के अन्तर्गत सर्व श्री आशुतोष जी महाराज की शिष्या साध्वी पदमहस्ता भारती जी ने ‘सीता-स्वयंवर’ का प्रसंग प्रस्तुत किया। प्रसंग में छिपे आध्यात्मिक तथ्यों की बड़े ही रोचक ढंग से विवेचना की गई। उसके साथ संगीतबद्ध प्रस्तुति सचमुच मन को हर लेने वाली थी। उन्होंने बताया कि पुष्प-वाटिका में प्रभु के साथ माता सीता के साक्षात्कार से पहले माता सीता को उनकी सखी प्रभु श्रीरामचंद्र जी के बारे में बताती है। विदुषी जी ने कहा कि जिस प्रकार सखी ने पहले प्रभु श्रीराम को देखा था, तभी वे सीता जी को श्रीराम के बारे में बता सकीं। उसी प्रकार जिसने सत्य की अनुभुति की है, ईश्वर का साक्षात्कार किया है, ईश्वरीय की कृपा को पाया है, वही व्यक्ति सत्य के बारे में बता सकता है। इसीलिए यदि हम भी प्रभु का साक्षात्कार करना चाहते हैं तो सर्वप्रथम संतों महापुरुषों का संग प्राप्त करना होगा।

वास्तव में माँ सीता और प्रभु श्री राम का मिलन ही सतसंग है और पुष्प-वाटिका सत्संग स्थल। परन्तु अभी श्री राम एवं सीता जी का मिलन हुआ नहीं क्योंकि अभी धनुष का टूटना बाकी है। जब जनकपुरी में बड़ें-2 योद्धा धनुष को उठा न सके। सीता जी ने विभिन्न देवी- देवताओं का आह्वान करना शुरु किया। यहाँ पर विचार करें कि अब तक हमारा मन विभिन्न प्रकार से विचलित होता है और जब परमात्मा के चरणों में पूर्ण समर्पण नहीं होता, तब तक इस आत्मा रूपी सीता का परमात्मा रूपी राम से मिलन नहीं हो सकता है। प्रभु श्री राम ने देर न लगाते हुए धनुष तोड़ ड़ाला। यहाँ धनुष अहंकार का प्रतीक है।

हमारे भीतर जब तक अहंकार है ईश्वर नहीं मिल सकता। एक साधक के जीवन में अहंकार सबसे बड़ा बाधक एवं शत्रु है। यदि हम भी ईश्वर की भक्ति करना चाहते हैं तो अपने अहंकार को त्यागकर प्रभु के चरणों में पूर्ण समर्पण करना होगा।  अंत में विदुषी जी ने कहा कि जब तक हम संत महापुरुषों का संग नहीं कर लेते, तब तक हम न तो ग्रंथों के वास्तविक संदेश को समझ सकते हैं और न ही अपने जीवन में प्रभु श्रीराम की वास्तविक भक्ति को प्राप्त कर सकते हैं। कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं के विशाल जनसमूह ने कथामृत का पान किया तथा सुमधुर भजनों की स्वर लहरियों पर सम्पूर्ण वातावरण भक्ति से सराबोर हो गया।