ऐसा है सूर्य का परिवार, यमराज, यमुना और शनिदेव का रिश्ता

सूर्यदेव को सृष्टि का जीवनदाता माना जाता है। सारे जगत को चलानेवाला और अपनी रश्मियों के तेज से ब्रह्मांड को प्रकाशित करने वाले सूर्यदेव के बगैर जीवन की कल्पना संभव नहीं है। कई पौराणिक ग्रंथों में सूर्यदेव का महिमामंडन किया गया है और सृष्टि के साथ उनके संबंध की विस्तृत व्याख्या की गई है। धर्मशास्त्रों में सूर्यदेव की उत्पत्ति के अनेक प्रसंग दिए गए हैं।

सूर्यदेव का परिवार

शास्त्रोक्त मान्यता के अनुसार भगवान सूर्य महर्षि कश्यप के पुत्र हैं और उनकी माता का नाम अदिती है। अदितीपुत्र होने के कारण उनका एक नाम आदित्य हुआ। सूर्यदेव के जन्म के संबंध में एक कथा प्रचलित है। एक बार दैत्य-दानवों ने मिलकर देवताओं को पराजित कर दिया और स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। पराजित देवताओं को इस कारण इधर -उधर भटकना पड़ा। देवमाता अदिति इस हार से निराश होकर भगवान सूर्य की उपासना करने लगी।

देवी अदिती के तप से प्रसन्न होकर सूर्यदेव प्रकट हुए और उन्होंने देवी अदिती से कहा कि मैं अपने हजारवें अंश से आपके गर्भ से जन्म लेकर आपके पुत्रों की रक्षा करूंगा। कुछ समय बाद देवी अदिती गर्भवती हुई और उनके गर्भ से सूर्यदेव का प्राकट्य हुआ। बाद में सूर्यदेव देवताओं के नायक बने और असुरों का संहार किया। सूर्यदेव के कुनबे का मत्स्य पुराण, भविष्य पुराण, ब्रह्म पुराण, मार्कण्डेय पुराण, पद्म पुराण, और साम्बपुराण में वर्णन है।

देवी संज्ञा से हुआ सूर्यदेव का विवाह

सूर्यदेव का विवाह विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से हुआ है। उनकी एक और पत्नी छाया है। भगवान सूर्य की कुल दस संतानें हुई। इनके पुत्रों में यमराज और शनिदेव हैं। इसके अलावा यमुना, वैवस्वतमनु, तप्ति, अश्विनी भी सूर्यदेव की संतानें हैं। इस तरह संज्ञा से सूर्य को जुड़वां अश्विनी कुमारों के रूप में दो बेटों सहित छह संताने हुईं जबकि छाया से सूर्यदेव की चार संताने हैं।

यमराज सूर्य के सबसे बड़े पुत्र और संज्ञा की प्रथम संतान हैं। देवी यमुना सूर्यदेव और संज्ञा की दूसरी संतान हैं, जो माता संज्ञा को सूर्यदेव से मिले वरदान के कारण धरती पर नदी रूप में प्रकट हुई। वैवस्वत मनु सूर्यदेव और संज्ञा की तीसरी संतान हैं। वैवस्वत मनु प्रलय के बाद संसार की रचना करने वाले पहले पुरुष बने और उन्होंने मनु स्‍मृति की रचना की।

शनिदेव हैं सूर्य और छाया की संतान

इस तरह सूर्य और छाया की प्रथम संतान शनिदेव है, जिनको न्यायाधीश और कर्मफल प्रदाता कहा जाता है। महादेव के वरदान से वो नवग्रह में सर्वश्रेष्ठ स्थान पर नियुक्‍त हुए। सूर्य और छाया की दूसरी संतान तप्‍ति है। तप्ति का विवाह सोमवंशी राजा संवरण के साथ हुआ। कुरुवंश के संस्थापक कुरु इन दोनों की ही संतान थे। सूर्य और छाया की तीसरी संतान विष्टि ने भद्रा नाम से नक्षत्र लोक में प्रवेश किया।

भद्रा भयंकर रूप वाली कन्या है और शनि की तरह ही इसका स्वभाव भी काफी तीखा है। भद्रा के स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए भगवान ब्रह्मा ने उन्हें कालगणना या पंचांग के एक प्रमुख अंग विष्टि करण में स्थान दिया है।सूर्य और छाया की चौथी संतान सावर्णि मनु हैं। वैवस्वत मनु की ही तरह वे इस मन्वन्तर के बाद अगले यानि आठवें मन्वन्तर के अधिपति होंगे।