और अधिक के लालच से अच्छा है कम में संतोष करना

एक मध्यप्रदेश के किसी राजा के बेटे को सांप ने काट लिया। राजा ने मुनादी कराई जिसने उनके बेटे ठीक कर दिया वह उसे बहुत बड़ा ईनाम देंगे। इस नगर के एक बनिए ने उनके बेटे को दवा दी तो वह ठीक हो गया। अब ईनाम देने की बारी आई तो राजा ने बनिए से कहा कि आप एक दिन में पैदल या घोड़े से चलकर जितनी जमीन नाप लोगे वह आपकी हो जाएगी।

राजा के ऐसा कहने पर लालची बनिया खुश हो गया। उसने सोचा कि जितनी भी राज्य की उपजाऊ जमीन और बगीचे हैं उन्हें वह नाप डालेगा और हमेशा फिर ठाठ से रहेगा। उसने पैदल चलने की बजाए घोड़े में बैठकर राज्य जमीन मापने की मांग रखी। इस राजा ने हां कर दिया लेकिन एक शर्त रखी कि उसे यह जमीन तभी मिलेगी जब वह दिन डूबने से पहले अपना ईनाम लेने के लिए दरबार में हाजिर हो जाएगा। चतुर बनिए ने फौरन हां कर दिया।

अब बनिए ने अगले दिन सुबह 6 बजे से ही घोड़े में सवार होकर राजा का आधे से ज्यादा राज्य नापने के लिए निकल पड़ा। दोपहर होने तक उसने राज्य का एक बड़ा हिस्सा नाप डाला। लेकिन देखा अभी तो आगे बहुत ही अच्छे बगीचे हैं वह उन्हें भी नाप ले तो और अच्छा होगा। इसी प्रकार, एक और बगीचा, एक और तालाब नापते-नापते उसे शाम के चार बज गए। लेकिन उसने देखा कि आगे तो सोने चांदी और हीरे मोतियों की खदान है वह इन्हें भी नाप ले तो आधे से ज्यादा राज्य उसका हो जाएगा। ऐसा करते करते उसे शाम हो गई। तभी उसके पीछे चल रहे राजा के सैनिकों ने कहा कि अब आपका समय समाप्त हो गया इसलिए अब वे घोड़ा लेकर पास राजा के पास जा रहे हैं।

अब बनिया राजदरबार में देर रात तक भी वापस नहीं लौट सका और लालच के चक्कर में कुछ भी न मिलने पर बहुत पछताया।

कहानी का सार – कई बार और अधिक पाने के लालच में कुछ भी हाथ नहीं लगता। इसलिए जो समुचित मिले उस पर ही संतोष करना चाहिए।