किसी के बारे में धारणा बनाने से पहले दूसरे पहलू के बारे में सोचें

हम रोजाना काफी सारे लोगों से मिलते हैं। कुछ ऑफिस के सहकर्मी होते हैं, कोई घर के आसपास रहता है, तो कई लोगों से हम रास्‍ते में मिलते हैं। इनमें से कई लोगों के बारे में हम अक्‍सर धारण बना लेते हैं। किसी के बारे में अच्‍छी, तो किसी के बारे में गलत धारणा बना लेते हैं। कई बार तो इनके पीछे अपने या किसी और के अनुभव शामिल होते हैं, तो कभी यह निराधार भी होती हैं।

मगर हमारी इस सोच के आधार पर उस व्‍यक्‍ति से हमारा संबंध भी प्रभावित होता है। कुल मिलाकर धारणा का चश्‍मा चढ़ाने के बाद हम सामने वाले व्‍यक्‍ति से खुद को सहज तरीके से पेश करने का मौका छीन लेते हैं। जैसा कि इस छोटी सी बच्‍ची के साथ हुआ।

एक बहुत प्यारी सी छोटी बच्ची ने अपने दोनों हाथो में दो सेब पकड़ रखे थे। उन्‍होंने उससे पूछा कि वह क्‍या कर रही है, तो उसने बताया कि उसे किचन में दो सेब मिले हैं। तो उसके पापा ने पास आकर बड़े प्‍यार से उससे पूछा, मेरी प्यारी परी, क्या तुम अपने पापा को तुम्हारे दो सेब में से एक सेब दोगी?

पापा की बात सुनते ही वह बच्ची कुछ समय के लिए अपने पापा को देखती रही। इसके बाद उसने जो किया उसकी पापा को जरा भी उम्‍मीद नहीं थी। उसने एक सेब का थोड़ा सा टुकड़ा खा लिया और देखते ही देखते जल्दी से दूसरे सेब का भी थोड़ा सा टुकड़ा खा लिया। उस बच्ची का बाप ये देखकर अवाक रह गया। खुद को जल्‍दी से संभालते हुए वह मुस्‍कराने लगा। वह अपनी मायूसी को अपनी प्यारी सी बेटी पर जाहिर नहीं होने देना चाहता था।

अगर आप सोच रहे हैं कि कहानी खत्‍म हो गई है, तो ऐसा नहीं है। इसके बाद उस बच्‍ची ने जो किया उसने उसके पिता को निरुत्‍तर कर दिया। उसने अपने एक हाथ में पकड़ा हुआ सेब पापा की तरफ आगे बढ़ाते हुए कहा, पापा आप ये खा लो। ये वाला ज्‍यादा मीठा है, दूसरा वाला उतना मीठा नहीं है। अब पापा की आंखों में पछतावे के आंसू थे। उन्‍होंने अपने बेटी को सेब वापस कर दिया और उसे अपने सीने से लगा दिया।

इस कहानी से हम 3 बातें सीख सकते हैं : 

 

  • हमें सामने जो नजर आ रहा है, उसके आधार पर अपने मन में अच्‍छी या बुरी धारणा नहीं बनानी चाहिए। कुछ समय रुककर असलियत के सामने आने का इंतजार करना चाहिए।

 

  • जो नजर आ रहा है उसके आधार पर अपनी धारणा तो बना लेते हैं। मगर समय आने पर हमारे पास पछताने के सिवा कुछ नहीं बचता है। कई बार तो पछतावे से परिस्‍थिति को संभाला भी नहीं जा सकता है।

 

  • हमें यह भी समझना चाहिए कि किसी की कही-सुनी बात के आधार अपनी अपनी सोच नहीं बनानी चाहिए। इससे हम अपनी समझ का इस्‍तेमाल नहीं करते हैं, बल्‍कि किसी और की बात के आधार पर अपनी योजना बना लेते हैं।