खुद की बनाई बेड़ियां ही अक्सर हमें आगे बढ़ने से रोकती हैं

प्रवीन शहर का जाना-माना वकील था। महज पैंतीस साल में उसने वह मुकाम हासिल कर लिया, जिसे पाने में लोग अपनी उम्र बिता देते हैं। कॉलेज के पचास वर्ष पूरे होने की खुशी में आयोजित एक समारोह में उसे मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया गया। प्रवीन गर्व से उस उत्सव में शामिल होने के लिए पहुंचा। वह अपनी शान-ओ-शौकत दिखाना चाहता था। कॉलेज में उसका खूब स्वागत किया गया। पर अंदर जाते ही प्रवीन का मुंह लटक गया।

उसने देखा, वहां उसकी क्लास में साथ-साथ पढ़े कुछ पुराने दोस्त भी आए थे और अपनी बातों में बेहद मसरूफ थे। सबकी शक्लें थोड़ी-थोड़ी बदल गई थीं और लिबास से लग रहा था कि सभी सुप्रतिष्ठित होंगे। पर उनमें से एक भी प्रवीन को नहीं पहचान रहा था। आखिर पहचानता भी कैसे, पिछले पंद्रह साल में एक बार भी प्रवीन ने किसी की तरफ पलट कर भी नहीं देखा था।

कुछ दोस्तों ने कॉलेज के बाद प्रवीन से एक-दो बार बात करने की कोशिश की भी, पर प्रवीन ने उनकी अनदेखी कर दी, क्योंकि उसे लगा कि वे पैसों के लिए उसके पीछे आ रहे हैं। प्रवीन उस पूरी पार्टी में खुद को बहुद छोटा और अकेला महसूस करने लगा। उसे इज्जत देने वाले और उसके इर्द-गिर्द घूमने वाले वे लोग थे, जिन्हें वह जानता भी नहीं था। उस दिन प्रवीन को महसूस हुआ कि जिंदगी में अच्छे दोस्तों की क्या अहमियत होती है।

प्रवीन मन ही मन खुद को कोसने लगा कि जिंदगी में इतना कामयाब होने के बावजूद वह हार गया। तभी प्रवीन की एक पुरानी टीचर वहां आ गईं और उससे बात करने लगीं।

जब प्रवीन ने अपने दिल की बात उन्हें बताई, तो वह बोलीं, बेटा, कोई भी चीज हासिल करने के लिए अपनी तरफ से प्रयास करना पड़ता है। तुम एक बार प्रयास करके देखो, आज भी अपने दोस्तों को वहीं पाओगे, जहां तुमने उन्हें छोड़ा था। वह शाम प्रवीन की जिंदगी की सबसे हसीन शाम थी, क्योंकि उस दिन के बाद प्रवीन ने कोई भी शाम दोस्तों के बगैर नहीं बिताई।