गुजराती समाज की महिलाएं नहीं करती गरबे की रिहर्सल

उज्जैन।शारदीय नवरात्रि के अवसर पर शहर में विभिन्न स्थानों पर गरबों का आयोजन किया जाएगा और इसके लिए युवतियों व महिलाओं द्वारा रिहर्सल भी करने का सिलसिला प्रारंभ हो गया है, लेकिन शहर में गुजराती समाज ही एक मात्र ऐसा होगा, जिसकी महिलाएं सीधे गरबे करती है, अर्थात रिहर्सल के लिए किसी तरह का कोई स्थान गरबा करने वाली महिलाओं या समाज के बीच बिल्कुल भी नहीं है।
खून में रची-बसी है गरबा संस्कृति
समाज के तत्वावधान में गुजराती धर्मशाला नईसड़क पर गरबों का आयोजन करीब बीस वर्षों से अधिक समय से हो रहा है। अमुमन गरबों में डीजे की धुन पर महिलाएं, युवतियां थिरकती है, परंतु गुजराती समाज के गरबों में पारंपरिकता का अंगीकार किया जाकर डीजे का उपयोग कदापि नहीं किया जाता है। समाज की कार्यकारिणी के वरिष्ठ सदस्य आशीष मेहता अक्षरविश्व को बताते है कि गुजराती समाज में तो खून में ही गरबे की संस्कृति रची बसी हुई है, इसलिए हमें सामूहिक रूप से गरबों की रिहर्सल करने की जरूरत ही नहीं होती।

हर दिन के लिए ड्रेस कोड
इस बार भी २९ सितंबर से गरबा आयोजन की शुरूआत होगी। समाज की ही महिलाओं व पुरूषों को हिस्सेदारी करने की अनुमति होती है, इसके लिए बकायदा अनुमति पास जारी होते है। आयोजन में हिस्सेदारी करने वाले वाले समाजजनों के लिए प्रतिदिन के लिए पारंपरिक ड्रेस कोड तय किया गया है। समाजजनों को आमंत्रण देने का काम शुरू हो गया है और निर्धारित समय पर ही रात को गरबे शुरू कर दिए जाएंगे।