गुरु पूर्णिमा धैर्य और संकल्प का दिव्य महोत्सव

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा दिल्ली स्थित दिव्य धाम आश्रम में गुरु पूजा के महान पर्व  के उपलक्ष्य में भव्य एंव विशाल कार्यक्रम का आयोजन किया गया| हजारों की संख्या में  श्रद्धालुओं ने कार्यक्रम में उपस्थित होकर गुरुदेव सर्व श्री आशुतोष महाराज जी के श्री चरणों में  आरती व पूजन अर्पित किया| गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर गुरु की पूजा, उनकी आराधना,  उनके आदर्शों को शिष्यों के दिलों में एक बार फिर से उजागर किया गया। दिव्य धाम आश्रम में  शिष्यों ने पूजनीय गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी के दिव्य गुरुप्रेम में पूर्णतः भीगते हुए इस  विशेष दिवस पर उन्हें अपने भाव अर्पण किए।

इस अवसर पर श्री आशुतोष महाराज जी की  शिष्या साध्वी परमा भारती जी ने प्रवचन करते हुए कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी भी अपने  गुरु की महिमा का व्याख्यान करते हुए कहते हैं कि मैं उन गुरु महाराज जी के चरण कमलों की वंदना करता हूँ, जो कृपा के सागर है और नररूप में श्री हरि ही है, अर्थात वो परम सत्ता जो  सगुण रूप में धरा पर अवतरित है, इतना ही नहीं है गुरु की महिमा को गाते हुए गुरु गीता ग्रंथ  में भगवान शिव भी मां पार्वती को समझाते हुए कहते हैं कि मनुष्य के लिए गुरु ही शिव रूप  है! गुरु ही देव है, गुरु ही बांधव है, गुरु ही आत्मा है, गुरु ही जीव है|

एक शिष्य के जीवन के  लिए गुरु के इलावा जीवन में और कुछ भी नहीं है| गुरु का स्थान एक शिष्य के जीवन में  सर्वोपरी हुआ करता है| इसलिए शिष्य अपने गुरु की पूजा वंदना करता है| जीवन में पूर्ण गुरु की  पूजा ही शिष्य के लिए सबसे बड़ा वरदान होती है, जो भाग्यशाली शिष्यों को प्राप्त होती है|  श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य स्वामी नरेन्द्रानंद जी ने बताया कि कई महीनों पहले से ही  आश्रम में इस पर्व को मनाने हेतु तैयारियां शुरू हो गई थी।

इस धार्मिक एवं दुर्लभ उत्सव के  लिए सभी स्वयंसेवकों ने मन और प्रेम से अपनी निस्वार्थ सेवा प्रदान की। स्वयंसेवकों के उत्साह  के पीछे सत्गुरु की प्रेरणा शक्ति है जो उन्हें अपने गुरुदेव के लक्ष्य में योगदान देने की ख़ुशी  अनुभव कराती है। जैसा कि वे विश्व शांति के महान लक्ष्य के लिए निरंतर कार्यरत हैं, गुरु  पूर्णिमा उत्सव उनके धैर्य और संकल्प को दृढ़ करता है जिसके पीछे गुरु का सौहार्दपूर्ण अनुग्रह  है। मंच से प्रेरणादायक प्रवचन और संगीत रचनाएँ श्रवण करते हुए, सभी शिष्यों ने निर्धारित  लक्ष्य हासिल करने के अथक और निरंतर चलने की प्रतिज्ञा ली!