जरूरी नहीं कि जो रास्ता दूसरों ने अपनाया हो, वह सही ही हो

एक बार एक कंपनी ने अपने कर्मचारियों के लिए रेस का आयोजन किया। सभी को दो-दो की टीम बनानी थी और अपनी कार ऑफिस लेकर आनी थी। रेस के लिए दस किलोमीटर का मार्ग निश्चित किया गया। कंपनी के एक ऑफिस से दूसरे ऑफिस तक पहुंचने की रेस थी। दूसरे ऑफिस का उद्घाटन हाल ही में किया गया था, इसलिए किसी को नए ऑफिस का पता मालूम नहीं था। सभी अपनी-अपनी गाड़ियों में बैठ गए और सभी को रेस के नियम समझा दिए गए। रेस का उद्देश्य नए ऑफिस तक कम समय में पहुंचना था।

यातायात के नियम का उल्लंघन करने से टीम बाहर हो सकती थी। रेस में एक गाड़ी राकेश की भी थी। हर कोई पूरी स्पीड में एक दूसरे से मुकाबला कर रहा था। सबको नक्शे दिए गए थे और नक्शों के सहारे ही उन्हें नए ऑफिस तक पहुंचना था। राकेश सबसे आगे-आगे चल रहा था। तभी एक टीम ने देखा, राकेश नक्शे से अलग कोई मार्ग लेने जा रहा था। राकेश की देखा-देखी कई लोग उस मार्ग पर मुड़ गए। सबको लगा कि यह जरूर कोई न कोई शॉर्टकट होगा, जिससे हम जल्दी पहुंच जाएंगे। सिर्फ एक-दो ही टीम ऐसी बचीं, जो नक्शे के बताए मार्ग पर निकलीं।

बाकी सारी टीमों ने अपना रास्ता बदल लिया और जल्दी पहुंचने की होड़ में राकेश का पीछा करने लगीं। कुछ दूर जाकर राकेश ने अपनी गाड़ी रोक दी। पीछे आते सारे लोग भी रुक गए। एक टीम ने राकेश से पूछा, क्या हुआ? राकेश बोला, मुझे इसी जगह इंतजार करने को कहा गया था। सभी टीमें अपनी किस्मत को कोसने लगीं। सबने अपनी गाड़ी घुमाई और वापस नक्शे वाले रास्ते से नए ऑफिस तक पहुंची।

जितनी टीमों ने शॉर्टकट अपनाया था, वे सभी रेस में हार गईं। उन्हें संबोधित करते हुए कंपनी प्रबंधन ने कहा, हम असल जिंदगी में भी यही करते हैं। सफल होने की दौड़ में हम अंधे हो जाते हैं और अपने मार्ग से भटक कर अपने उद्देश्यों  को भूल जाते हैं।