जानिए क्यों मनाई जाती है गुरु पूर्णिमा, क्या है इसका महत्व

आषाढ़ की पूर्णमासी के दिन गुरु पूजा का पावन पर्व मनाया जाता है| इस दिन चाँद भी अपने पूरे यौवन  पर चाँदनी बिखेरता है| गुरु पूजा का पर्व भक्तों के लिए बड़ा ही महत्वपूर्ण हुआ करता है क्योंकि जन्म से  तो सिर्फ यह जीवन मिला पर आज का दिन तो उस गुरु के पूजन का दिवस है जो जीवन को सम्पूर्णता  प्रदान करता है|  क्या आप जानना चाहते है कि वैज्ञानिक भी आषाढ़ पूर्णिमा की महत्ता को समझ चुके हैं? “विस्डम ऑफ़  ईस्ट” पुस्तक के लेखक आर्थर स्टोक लिखते है – जैसे भारत द्वारा खोज किए गए शून्य, छंद, व्याकरण आदि की महिमा अब पूरा विश्व गाता है, उसी प्रकार भारत द्वारा उजागर की गई सतगुरु की महिमा को  भी एक दिन पूरा विश्व जानेगा! यह भी जानेगा कि अपने महान गुरु की पूजा के लिए उन्होंने आषाढ़  पूर्णिमा का दिन ही क्यों चुना? ऐसा क्या ख़ास है इस दिन में? स्टोक ने आषाढ़ पूर्णिमा को लेकर कई  अध्ययन व शोध किए!

इन सब प्रयोंगो के आधार पर उन्होंने कहा – “वर्ष भर में अनेकों पूर्णिमा आती हैं  – शरद पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा, वैशाख पूर्णिमा…. आदि! पर आषाढ़ पूर्णिमा भक्ति व ज्ञान के पथ पर  चल रहे साधकों के लिए एक विशेष महत्व रखती है! इस दिन आकाश में अल्ट्रावायॅलेट रेडिएशन फ़ैल  जाती है! इस कारण व्यक्ति का शरीर व मन एक विशेष स्थिति में आ जाता है! अत: यह स्थिति साधक  के लिए बेहद लाभदायक है! कहने का भाव कि आत्म-उत्थान व कल्याण के लिए गुरु पूर्णिमा का दिन  वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी अति उत्तम है!  दीपावली पर तो सिर्फ मिट्टी के दीए जलाए जाते हैं

पर आज तो उस आलौकिक शख़्सियत का दिन है जो  हमारे अन्तःकरण में सदैव के लिए आलौकिक दीपों की माला जगमगा देते है| होली के त्यौहार पर हम  बाहर से एक दूसरे को कच्चा रंग लगाते हैं पर आज तो उस गुरु की अर्चन पूजन का दिन है जो हमारे  तन-मन और सम्पूर्ण जीवन को भक्ति के मजीठ रंग में रंग देते हैं| बसंत ऋतु की मन-मोहनी बहार देख  कर सम्पूर्ण सृष्टि झूम उठती है पर आज का दिन उसकी पूजा का दिन है जो हमारे अन्तःकरण में ऐसी  बहार प्रकट कर देता है जिसे प्राप्त कर एक भक्त का हृदय झूम-झूम कर यही कहता है :-

“निशि दिन  आनंद रूप दीवाली, सदा बसंत सोहायो ||

प्रेम महोत्सव नित ही उत्सव, सबै ठाट मन भायो ||”

 निःसंदेह वेद व्यास जी के शिष्यों ने इस आलौकिक आनंद को प्राप्त किया तभी तो उन्होंने सभी गुरु  भक्तों को यह आनंद प्रदान करने हेतु गुरु पूजा पर्व की परम्परा का शुभ आरंभ किया| आज से कई  हज़ार वर्षों पूर्व इस दिन वेद व्यास जी अवतरित हुए थे| इसलिए उनके शिष्यों ने अपने गुरु के जन्म दिन  के महान दिवस को ही गुरु की पूजा के लिए चुना| यही कारण है कि गुरु पूजा दिवस को “व्यास पूर्णिमा”  भी कहा जाता है| आज हजारों वर्षों बाद भी गुरु पूजा की परम्परा प्रतिष्ठित है क्योंकि गुरु वही है और  उसके द्वारा प्रदान किया ज्ञान भी वही है|  आज भी अज्ञानता को दूर करने की युक्ति वही है जो महापुरुषों ने सृष्टि के आरंभ में दी थी| वह युक्ति  है कि गुरु अपने शिष्य के नेत्रों में ज्ञान रूपी अंजन डालते हैं|

जिससे शिष्य के जन्मों–जन्मों की अज्ञानता  दूर हो जाती है| गुरु शब्द इतना महान है कि इसके तुल्य संसार में अन्य कोई शब्द नहीं| गुरु का  आगमन शिष्य के अन्धकारमय जीवन को प्रकाशमय बना देता है| एक शिष्य के लिए उसके गुरु ही  सर्वस्व हुआ करते हैं|

उसका विश्वास, उसकी सोच, उसकी पूजा आराधना सिर्फ गुरु होते हैं| एक सच्चा  शिष्य जानता है कि उसके गुरुदेव अमृत के तुल्य पवित्र अतः सूर्य के तुल्य प्रकाशमान, चंद्रमा के तुल्य  शीतल अतः ब्रह्माण्ड के समान रूपवान है| इस सम्पूर्ण सृष्टि में यदि कोई पूजन योग्य शक्ति है तो वह  केवल सतगुरु हैं – जो सभी जीवों के दातार और सब का आधार हैं| यदि कोई पूजा की स्थली है तो वह  सिर्फ गुरुदेव के चरण हैं क्योंकि सतगुरु एक ऐसा पवित्र सरोवर हुआ करते हैं जिसमें स्नान कर शिष्य  अपने अवगुणों से मुक्ति पा लेता है| जिसके सुन्दर घाट पर अब तक अनेकों ही थके हारे पथिकों ने सुख-  शांति, समृद्धि और समाधि के सुख को अनुभव किया|

 कुछ लोग अपने सुन्दर व्यक्तित्व के कारण हमारे लिए पूजनीय होते है, कुछ लोग अपने उत्तम आचरण  के कारण मान योग्य होते है और कुछ करीबी होने के कारण हमारे प्यारे होते है| परन्तु परमात्मा का  दर्शन करवा हमारे जीवन में ऐसी पूर्णमासी लाने वाले चाँद के समान गुरु तो सर्वस्व हुआ करते है|

वह  पूजन योग्य और सन्मान योग्य होते है| यही कारण है कि शास्त्र-ग्रंथों में तन-मन से गुरु की पूजा और  अर्चना करने का निर्देश दिया है – गुरु परमेसुरु पूजीऐ मनि तनि लाइ पिआरु||  एक भक्त की अपने गुरुदेव के श्री चरणों में सदैव यही प्रार्थना रहती है कि हे सतगुरु, हर जन्म में  आपका ही साथ रहे, मैं सेवक बन कर आपकी सेवा करता रहू, आपकी भक्ति में लीन रहूँ|