जानें, मोबाइल-लैपटॉप से कैसे ‘सूख’ रहीं आंखें

अगर आप अपना ज्यादातर समय मोबाइल और कंप्यूटर पर बिताते हैं, तो एक बार अपनी सेहत पर भी एक नजर डाल लें। विशेषज्ञों के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट्स पर ज्यादा समय तक काम करने से न सिर्फ आंखों की रोशनी पर फर्क पड़ता है, बल्कि इससे अनिंद्रा, सुनने की कम क्षमता और दिल की बीमारियों का खतरा भी बना रहता है। अस्‍पतालों में भी इस तरह के मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है। नेत्र विभाग में पहले जहां 15 से 20 मरीज आंखों में ड्राइनेस के आते थे, वहीं अब इनकी संख्या बढ़कर 60 से 80 हो गई है।

डॉक्टर का कहना है कि अक्सर देखने में आता है कि सड़क पर चलते समय, रेल, मेट्रो, ऑटो में सफर करने वाले अधिकतर युवा हाथ में मोबाइल और कान में हैडफोन लगाए रहते हैं। पिछले एक साल में तेज आवाज में गाने सुनने की क्षमता में कमी के सैंकड़ों मरीजों की वह जांच कर चुके हैं। उन्हें दवा देने के साथ मोबाइल का इस्तेमाल कम से कम करने की सलाह दी जाती है। वहीं, आखों की बीमारियां होने के मामले 35 प्रतिशत तक बढ़े हैं।

फोर्टिस हॉस्पिटल में नेत्र विज्ञान निर्देशक डॉक्टर ने बताया कि आंखों की रोशनी पर प्रदूषण का स्‍तर भी असर डाल रहा है। उनकी ओपीडी में आने वाले 50 प्रतिशत मरीजों में आंखों की समस्या इसी से हो रही है। गुड़गांव सिविल हॉस्पिटल के आई स्पेशलिस्ट डॉक्टर रमन शुक्ला बताते हैं कि बच्चों के चेकअप के लिए आए उनके परिजन बताते हैं कि उनके बच्चे टीवी पर कार्टून और मोबाइल पर हद से ज्यादा गेम खेलते हैं, जिससे उनकी आंखों में पानी आना, कम दिखाई देने की शिकायत हो गई है। आंखों का रेटीना एक हद तक ही रोशनी सहन कर पाता है।

इन मामलों पर फरमाएं गौर

केस-1
कानपुर के एक प्राइवेट स्कूल में पहली क्लास में दाखिला लेने वाले बच्चे की हरकतों पर टीचरों को शक हुआ। नजर रखने पर पता चला कि 6 साल का मासूम पैरंट्स के मोबाइल पर पॉर्न देखने का लती हो चुका है। आपत्तिजनक हरकतों के बाद स्कूल मैनेजमेंट ने अभिभावकों को बुलाकर कहा कि इस बच्चे को कहीं और पढ़ा लीजिए।

केस-2
18 साल की किशोरी मोबाइल की लती थी। कॉलेज में उसके कई दोस्तों से ‘अजीब’ संबंध थे। कॉलेज प्रबंधन ने अभिभावकों को बुलाकर किशोरी को निकाल दिया। घर में उससे मोबाइल छीना गया तो वह चौथी मंजिल से कूद गई। गंभीर चोटों के बाद रीढ़ की हड्डी का ऑपरेशन हुआ। अब फिजियोथेरेपी के साथ मनोवैज्ञानिक का इलाज जारी है।

बच्‍चा रोकर मांगे तो न दें मोबाइल
मनोवैज्ञानिक डॉ.  के अनुसार, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने समस्या को ‘सोशल मीडिया एडिक्शन डिसऑर्डर’ नाम दिया है। ऐसे बच्चों को चिंता, घबराहट और नींद न आने की समस्याएं होने लगती हैं। मेट्रो शहरों में मोबाइल या इंटरनेट की लत छुड़ाने के लिए क्लिनिक खुल चुके हैं। अभिभावकों की काउंसलिंग के साथ बच्चों को आउटडोर खेलों में लगाना होगा। बच्चा रोकर मोबाइल मांगे तो कभी न दें। वह थोड़ी देर में चुप हो जाएगा।

ये सावधानियां बरतें

वातावरण में थोड़ी नमी रखें

हरी सब्जियां, मौसमी फल का सेवन करें

काम करते हुए बीच-बीच में ब्रेक दें

पेय पदार्थों का सेवन अधिक करें

लगातार बिना पलके झपके ज्यादा देर तक कंप्यूटर पर काम न करें