जोर से भजन गाना नहीं, ईश्वर भाव में प्रतिष्ठित होना है साधना

‘ईश्वर’ शब्द के अनेक अर्थ हो सकते हैं, पर शब्द का साधारण अर्थ है नियंता। जो इस विश्वकल्पना का नियंत्रण करते हैं, वे हैं ईश्वर। सब बंधनों से मुक्त पुरुष को भी दार्शनिक शब्दावली में ईश्वर कहा जाता है। हालांकि साधक की दृष्टि से देखें तो ईश्वर सगुण ब्रह्म या भगवान को छोड़ कर कुछ भी नहीं है। ‘प्रणिधान’ शब्द का अर्थ है अच्छी तरह समझना या किसी को अपने आश्रय के रूप में अपनाना। इस तरह ईश्वर-प्रणिधान का अर्थ हुआ ईश्वर भाव में अपने को स्थित करना यानी ईश्वर को जीवन के एकमात्र आदर्श के रूप में ग्रहण करना। इसीलिए ईश्वर-प्रणिधान पूरा भावाश्रयी है, पूर्णतया एक मानसिक चेष्टा है। इसमें गला फाड़-फाड़कर चिल्लाने, लोगों की भीड़ जमा करने या झाल, मृदंग बजाकर भक्ति दिखाने का अवकाश ही नहीं है। तुम्हारे ईश्वर बधिर नहीं हैं। तुम अपने मन की भाषा उसे चिल्ला कर मत सुनाओ। ईश्वरीय भाव लेने के लिए पहले मन को जागतिक प्रपंच से हटा लेना होगा। प के तीन प्रकार हैं। वाचनिक यानी ऊंचे स्वर से पुकार कर उनकी दृष्टि अपनी ओर खींचने की चेष्टा करना एकदम बेकार है। श्रद्धा-प्रेम, निष्ठा-भक्ति भीतर की चीजें हैं। ये खुशामदी लोगों की बंधी-बंधाई भाषा में चीख पुकार कर व्यक्त करने की चीज नहीं।

इसलिए वाचनिक जप अर्थहीन है। मगर हां, आंतरिक भाव का आनंद जब मुख खोल कर व्यक्त करने की इच्छा जाग जाती है तो ब्रह्म संबंधी तथ्य सरल भाषा में श्लोक या गान के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। जब अस्फुट स्वर से होठों में ही मंत्र उच्चरित होते हैं, उसे उपांशु जप कहा जाता है। यद्यपि यह जप वाचनिक जप से अच्छा है, परंतु आदर्श कहलाने योग्य यह भी नहीं। ईश्वर-प्रणिधान में मानसिक जप ही श्रेष्ठ है। जिसका भाव मन लेता है उस भाव का उच्चरण भी मन ही करेगा।

मन ही उस भाव की बात सुनेगा। यह मानसिक जप उपयुक्त पात्र के पास यथाविधि सीख कर नियमित रूप से यथाविधि अभ्यास करना चाहिए। कुछ ही दिनों में मन एक विशेष धारा प्रवाह में अग्रसर होता प्रतीत होगा। जिसने साधना का ठीक-ठीक क्रम जान लिया है, उसमें इस प्रकार के लक्षणों का प्रकट होना एकदम स्वाभाविक है। इसमें किसी प्रकार का क्लेश नहीं, आनंद है। आधक जब ईश्वर भावना में दीर्घ समय के लिए प्रतिष्ठित होने में सक्षम होता है तब ये भाव मानसिक देह में क्रियाशील होते हैं और इनके प्रभाव से स्थूल देह बहुत हद तक शांत हो जाती है। ईश्वर-प्रणिधान अकेले तथा सामूहिक- दोनों प्रकार से किया जा सकता है। संयुक्त ईश्वर-प्रणिधान में सबकी सामूहिक मानसिक प्रचेष्टा एक साथ काम करना आरंभ कर देती है। इसलिए उन्नत भाव के लक्षण भी अत्यंत अल्प काल में ही जाग उठते हैं।

प्रस्तुति- दिव्यचेतनानंद अवधूत