दिखावे से नहीं सोच बदलने से मिलती है कामयाबी

बात उस समय की है जब देश का विभाजन हो रहा था, तब बहुत सी ऐसी बातें उठी थी, जिससे हर इंसान को हर दिन एक नई सीख मिली थी।

आज हम आपको विभाजन के समय की एक अनोखी घटना के बारे में बताने जा रहे हैं। विभाजन के समय नोआखाली में भीषण दंगों की खबरों से पूरा देश दहल उठा था। महात्मा गांधी स्वयं नोआखाली की यात्रा पर निकल गए ताकि लोगों को समझा-बुझा कर माहौल को शांत कर सकें। यात्रा के दौरान जब गांधी जी देवीपुर पहुंचे तो पाया कि वहां उनके स्वागत के लिए ध्वज, तोरण, पताका और फूलों से भव्य सजावट की गई है। गांधी जी का उस दिन मौनव्रत भी था, इसलिए उस समय वह चुप रहे। शाम को जब उनका मौनव्रत खुला तो उन्होंने इस बारे में पूछताछ शुरू की। उन्होंने पाया कि उनके आगमन को लेकर स्थानीय लोगों में खासा उत्साह था मगर यह उत्साह गांधी जी को खुशी नहीं दे रहा था। महात्मा गांधी ने वहां के एक कार्यकर्ता को पास बुलाया और उससे पूछा, ‘‘आप ये चीजें कहां से लाए?’’

कार्यकर्ता बोला, ‘‘बापूू जी, आप आने वाले थे इसलिए हमने 8-8 आने मिलाकर 300 रुपए इकट्ठा किए। उसी से यह खर्च किया है। फूल वगैरह यहां गांव में नहीं मिल सकते थे, सो ये सब हमने बड़ी मेहनत से आसपास के शहरों से मंगवाए।’’

उस कार्यकर्ता से पूरी बात समझ लेने के बाद गांधी जी ने आयोजकों को बुलाया और उनसे बोले, ‘‘मुझे लगता है आप सब मुझे धोखा दे रहे हैं। मैं इस समय ग्लानि की ज्वाला में जल रहा हूं। मेरे प्रति प्रेम प्रकट करने के लिए आपने इतनी भव्य सजावट की, उस पर इतने पैसे खर्च किए, यह अनुचित है। आपको मेरे प्रति प्रेम है तो मेरे कहने पर अमल करें, अपने व्यवहार को बदलने की कोशिश करें, अहिंसा और प्रेम फैलाएं। नोआखाली के कत्लेआम के बाद फूलों पर रुपया खर्च करना आपको कैसे सूझा, यह मैं समझ नहीं सका।’’

गांधी जी की बात सुनकर कार्यकर्ताओं को अपनी गलती का अहसास हो गया। उन्होंने निश्चय किया कि भविष्य में दिखावा बिल्कुल नहीं करेंगे।