दुनिया को मिठास का तोहफा देने वाले मिल्टन हर्शे ने कई बार देखी असफलता

ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि सफलता के शिखर पर पहुंचने वाले शख्स ने कभी हार का सामना नहीं किया होगा। दुनिया के कई महान विचारकों का मानना है कि पराजय सफलता की ओर बढ़ा पहला कदम होता है।

मगर इसमें ध्यान रखने वाली बात यह होती है कि सफल वही होते हैं, जो हार से घबराकर अपना रास्ता नहीं बदलते या हथियार डालकर नहीं भागते। ऐसी शख्सियत थे हर्शेज चॉकलेट मैनुफैक्चरिंग कंपनी के मिल्टन एस. हर्शे।

मिल्टन हर्शे का जन्म 13 सितंबर को 1857 को अमेरिका के पेनसिल्वेनिया स्थित डेरी चर्च के पास फार्म में हुआ था। वह अपने माता-पिता हेनरी हर्शे और वेरोनिका स्नेवली की इकलौती जीवित संतान थे। उनके परिवार को जीविका की तलाश में कई बार जगह बदलना पड़ा, जिससे मिल्टन हर्शे की पढ़ाई काफी बुरी तरह प्रभावित हुई।

किसी तरह अपनी शिक्षा पूरी करने वाले मिल्टन 30 साल की उम्र में कारोबारी असफलता का शिकार हुए और दीवालिया घोषित कर दिए गए। फिलाडेल्फिया में 1876 में वह अपने पहले कैंडी बिजनेस में बुरी तरह फेल हुए। तकरीबन 6 साल की कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने अपना दूसरा कैंडी बिजनेस न्यूयॉर्क शहर में शुरू किया और इसमें भी फेल हो गए।

लगातार असफलताओं और मुश्किलों के बावजूद वह 1886 में वह लैंकास्टर पहुंचे और यहां उन्होंने लैंकास्टर कैरेमल कंपनी की स्थापना की। इस बार उन्हें सफलता का स्वाद चखने को मिला। उनकी कंपनी के कैरेमल का पूरी दुनिया में निर्यात किया जाने लगा और उन्होंने खूब मुनाफा कमाया।

1893 में हर्शे को मौका मिला शिकागो में वर्ल्ड कोलंबियन एक्सपोजिशन में चॉकलेट बनाने की विधा को जानने का। यहीं से उनके दिमाग में चॉकलेट बनाने वाली कंपनी खोलने के आइडिया ने जन्म लिया। उन्होंने 1900 में अपनी कंपनी लैंकास्टर कैरेमल कंपनी को 10 लाख डॉलर में बेच दिया। इस पैसे से उन्होंने अपने जन्म स्थान डेरी चर्च के पास 1200 एकड़ का फार्म खरीदा और उस समय दुनिया की सबसे बड़ी चॉकलेट बनाने वाली कंपनी की नींव डाली। इसमें उन्होंने दुनिया की सबसे उन्नत तकनीक का इंतजाम किया।

छोटे-बड़े प्रयोगों का प्रयासों के बाद उन्होंने अपना खुद का फॉर्मुला बनाया, जो 1907 में हर्शेज किस के नाम से मश्हूर हुआ। 1915 में पत्नी कैथीन स्वीनी की असमय मृत्यु के बाद उन्होंने अपनी पूंजी का बड़ा हिस्सा जन सेवार्थ काम के लिए दान कर दिया। हर्शे चॉकलेट कंपनी का मालिकाना अधिकार भी उन्होंने हर्शे ट्रस्ट को सौंप दिया। 1945 में 13 अक्तूबर को 88 साल की उम्र में उन्होंने हर्शे हॉस्पिटल में आखिरी सांस ली।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है

 

हार का मुंह देखे बिना सफलता का स्वाद चखने को नहीं मिलता है। मगर हार के बाद सफलता भी उसे ही मिलती है, जो अपना रास्ता नहीं बदलता है या हथियार नहीं डालता है। पिछली गलतियों से सबक लेकर जो आगे बढ़ता है, उसे मंजिल जरूर मिलती है।

दूरदर्शिता होना भी बेहद जरूरी है। आप जो काम कर रहे हैं, उसमें आपको बार-बार असफलता हाथ लग रही है तो आपको अपने रास्ते पर एक बार फिर सोचने की जरूरत है। इसलिए सफल होने के लिए हमारे अंदर दूरदर्शिता, जोखिम लेने का साहस और क्षमता होना बेहद जरूरी है।

मंजिल पर पहुंचने के लिए धैर्य का होना भी बेहद जरूरी है। हमने कोई काम किया और चाहें कि उसका नतीजा हमें तुरंत मिल जाए, ऐसा नहीं होता है। कई बार हमारे काम का नतीजा आने में काफी समय लग जाता है। इसके अलावा सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता है।