ध्यान से ही दूर होता है तनाव

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा दिल्ली के दिव्य धाम आश्रम में मासिक सत्संग समागम का भव्य आयोजन किया गया। हज़ारो की संख्या में भक्त श्रद्धालुओं ने कार्यक्रम का आनंद उठाया।  गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या ने बताया कि हमारे जीवन के तनाव और व्याकुलता का केवल एक ही कारण है। वह है मन की अस्थिरता और इस विकलता अर्थात् अस्थिरता से उबरने का एक ही उपाय है। वह यह कि हम अपने अस्तित्व के आधारभूत स्थिर-बिंदु को खोजें और उसमें जुड़ने की कला सीख लें। हमारे आर्य-ग्रन्थों के अनुसार इस कला अथवा स्थिर-जीवन की पद्धति को ‘ध्यान’ कहा गया। उन्होंने बताया कि एक साधक के जीवन में ध्यान का क्या महत्व है।

जब एक साधक अंतर में ईश्वर का ध्यान करता है तो उसके समस्त विकारों का जड़ से नाश हो जाता है।  ध्यान के द्वारा मनुष्य हर क्षेत्र में विजय प्राप्त करता हुआ अपने लक्ष्य को पूर्ण कर लेता है। इसमें इतनी शक्ति है कि निरंतर अभ्यास से मनुष्य विपरीत परिस्थितियों को भी अपने अनुकूल कर सकता है। भगवान श्री कृष्ण गीता में अर्जुन को ध्यान के बारे में बताते हुए समझाते है कि जैसे वायुरहित स्थान में दीपक विचलित नहीं होता वैसा ही चित्त आत्मा के ध्यान में लगे हुए एक योगी का होता है। परंतु हमें यह जानना होगा कि वास्तव में ध्यान है क्या? ध्यान = ध्याता + ध्येय। ध्याता एक साधक होता है। ध्येय वह लक्ष्य जहां पर ध्यान लगाया जाता है। वेदों के अनुसार सर्वोत्तम ध्येय केवल मात्र ईश्वर हैं जिनका ध्यान करने से मनुष्य के समस्त पापों का नाश हो जाता है। मनुष्य के भीतर ईश्वर का प्रकटीकरण  एक पूर्ण सद्गुरु ही करा सकते है।

और फिर ध्यान की सनातन प्रक्रिया का अभ्यास एक पूर्ण सतगुरु के सान्निध्य में ही किया जा सकता है। स्वामी जी ने गुरु सत्ता के बारे में बताते हुए कहा कि एक बार माँ पार्वती ने भगवान शिव के समक्ष अपनी जिज्ञासा को रखते हुए कहा – प्रभु, आप गुरु सत्ता को इतना महिमागान क्यों कर रहे हैं? समाज को गुरु की ओर अथवा उनकी सेवा की ओर प्रेरित क्यों कर रहे हैं? भगवान शिव माँ पार्वती को गुरु सत्ता के बारे में बताते हुए कहते हैं कि इस सृष्टि में गुरु ही मात्र ऐसी सत्ता है जिनके द्वारा मानव ब्रह्मविद्या या तत्त्वज्ञान को प्राप्त कर अपना जीवन कल्याण की ओर अग्रसर कर सकता है।

आध्यात्मिक ज्ञान एक अत्यंत विस्तृत विषय है। यह ज्ञान सागर का अत्यंत अनमोल रत्न है जिसे परा विद्या भी कहा गया है। इस विद्या को हमारे तत्त्ववेता ऋषि-मुनियों ने अलग-अलग नामों जैसे कि- राजविद्या, आत्मज्ञान, ब्रह्मविद्या, तत्त्वज्ञान, योगविद्या आदि से सम्बोधित किया है। ध्यान-साधना बाह्य या ऐन्द्रिक अनुभवों का अवरोध करना भर नहीं है। अपने बोध को किसी ‘खालीपन’ पर टिका देना भी नहीं बल्कि ध्यान स्वबोध को एक दिव्य, अलौकिक, परमोज्ज्वल तत्त्व में ले जाना है, जो हमारे अंदर ही समाया हुआ है। कार्यक्रम के अंत में प्रसाद का भी वितरण किया गया!