निहित स्वार्थों में उलझे जनप्रतिनिधि

उज्जैन। कमजोर राजनीतिक नेतृत्व, लचर प्रशासन और निहित स्वार्थों में उलझे जनप्रतिनिधियों के कारण उज्जैन नगर निगम में इन दिनों अराजकता की स्थिति बनी हुई है। हालत यह कि पार्षदों को अपने वार्डों में काम कराने के लिए महापौर एवं नगर निगम आयुक्त के आसपास घूमना पड़ता है।
ऐसा नहीं है कि पार्षद कांग्रेस के हों। बल्कि भाजपा के पार्षद भी इसके भुक्त भोगी है। लेकिन संगठन के दबाव के कारण वह खुलकर कुछ नहीं बोल पाते हैं। पूर्व में जब पार्षदों द्वारा नाराजगी व्यक्त की गई थी तो उस दौरान महापौर द्वारा एमआईसी के तीन सदस्यों को बाहर कर दिया था। जिन्हें बाद में एमआईसी में शामिल किया गया। वर्तमान समय में प्रेमछाया प्रकरण संवादहीनता और प्रशासनिक अराजकता का बेहतरीन उदाहरण है। नगर निगम में बैठे जनप्रतिनिधियों को लगता है कि वही सब कुछ है।

महापौर और उनकी महापौर परिषद की प्रशासनिक अनुभवहीनता का ही परिणाम है कि प्रेमछाया प्रकरण में यू टर्न लेना पड़ा है। महापौर परिषद में निर्णय कुछ होते हैं, मिनिट्स कुछ और लिखे जाते हैं, पालन कुछ अलग ही होता है। महापौर निवास की अज्ञात सत्ता के सामने महापौर परिषद भी निष्प्रभावी है। निगम प्रशासन में शीर्ष स्तर पर अबोला है। महापौर-आयुक्त- में समन्वय का अभाव है। महापौर नामक संस्था इस बोर्ड में निरीह और निष्प्रभावी बनकर रह गई है।

महापौर और आयुक्त के बीच समन्वय नही होना इसी सत्ता समीकरण के निहित स्वार्थों की परिणिती है। भाजपा संगठन भी निगम की अराजकता पर लगाम नही लगा पा रहा हैं। संगठन के कर्णधार निगम से पोषित हो रहे हंै, उपकृत हो रहे हंै, लिहाजा उनका नैतिक दबाब बेअसर हो गया है। बहरहाल स्वच्छता सर्वेक्षण में पिछली बार निस मैनेजमेंट से हम 12 नम्बर पर आए थे अब उसकी गैरहाजिरी में हम कितने नम्बर पर आते देखना है। शायद 50 के बाद।

प्रकाश त्रिवेदी