पुस्तक का अपना वजूद, जिसे कोई डिगा नहीं सकता

उज्जैन। कहानी सुनने का शौक हमारे यहां दादा-दादी के जमाने से चलता आया है। कहानी सुन कर हमारी पौध में संस्कार विकसित हुआ है। बुधवार को सूर्यकांत नागर, प्रभु जोशी, डॉ. एमजी नाडकर्णी, ज्योति जैन और मीनाक्षी स्वामी जैसे कथाकारों ने अपनी कहानियों के माध्यम से किंडल, इंटरनेट व अन्य संसाधन के युग में बताया कि पुस्तक का अपना वजूद है जिसे कोई डिगा नहीं सकता। इस सत्र का समन्वय कथाकार संदीप सृजन ने किया। अतिथि मुरैना में पदस्थ स्टेट सर्विस के वरिष्ठ अधिकारी व कथाकार तरुण भटनागर थे। कहानी सत्र की शुरुआत ज्योति जैन की कहानी से हुई। नजरबट्टू नाम की रचना ने श्रोताओं का ध्यान आकर्षित किया। भूख और गरीबी का बेबाक चित्रण ज्योति जैन ने अपनी कहानी में किया। सरस शैली और बातचीत के अंदाज में उनकी रचना ने नया बिंब प्रस्तुत किया।

डॉ एमजी नाडकर्णी ने कहानी नि:शब्द का पाठ किया। इंदौर से आईं कथाकार मीनाक्षी स्वामी ने अपनी कहानी बगुला बैठा ध्यान में का पाठ किया। यह कहानी सामान्य तौर पर पुरुष की स्त्री पर केंद्रित मानसिकता को दर्शाती है। वरिष्ठ कथाकार सूर्यकांत नागर, प्रो. गोविंद प्रसाद शर्मा ने भी संबोधित किया। इस अवर पर साहित्यकार शिव चौरसिया, शैलेंद्र कुमार शर्मा सहित बुद्धिजीवी मौजूद थे।