प्रभु भक्ति का रंग लगा के, जीवन को सफ़ल बनाए – श्री आशुतोष महाराज जी

‘पर्व’ जीवन के उल्लास भरे अंतराल हैं। रोजमर्रा के मरुस्थल में सरसब्ज़ बाग की तरह हैं। भारतवर्ष के पर्वों की शृंखला को देखें, तो एक-एक पर्व अपने में एक महान ऐतिहासिक गाथा समेटे हुए है।

हमारे त्यौहारों में ऋषि-मनीषियों का दिव्य चिंतन छिपा है। आदर्शों और प्रेरणाओं की सुगंधि है। जीवन का ऊँचा मार्गदर्शन है। ‘मनोरंजन’ से भरा होली का त्यौहार भी ‘आत्म-मंथन’ के गीत गाता है। वैदिक काल में, होलिकोत्सव ‘विश्वदेव-पूजन’ के रूप में मनाया जाता था, जिसमें हमारे ऋषि यज्ञ-अग्नि का आह्वान किया करते थे। मंत्रोच्चारण की ध्वनियों के बीच गेहूँ, चना, जौं आदि के बीज तेज अग्नि में स्वाहा किए जाते थे।

भावना यही होती थी कि वातावरण में दैवी तरंगें प्रबल हों और दानवी बलों का विनाश हो। गहराई में देखें, तो ‘होली’ शब्द का अर्थ ही है- बुराई को जलाना, स्वाहा करना! पुराणों में अनेक-अनेक राक्षसियों-होलिका, होलाका, पूतना, यहाँ तक कि कामदेव के दहन को होली-उत्सव से जोड़ा गया है।

होली- भक्ति की शक्ति पर विजय!
होलिका-दहन की गाथा श्रीमद्भागवत महापुराण और नारद पुराण में पढ़ने को मिलती है। कथा के अनुसार जब हिरण्यकशिपु की बहन ‘होलिका’, जिसे अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था, उसने प्रह्लाद को मारने हेतु गोद में बिठाया और अग्नि की ज्वलनशील लपटों में जाकर बैठी, तो प्रभु-कृपा से प्रह्लाद चंदन की तरह शीतल रहा और होलिका जलकर भस्म हो गई।

तभी से भारतवर्ष में होलिकोत्सव मनाया जाने लगा। होलिका-दहन के प्रतीक रूप में स्थान-स्थान पर लकड़ियों का संगठन कर आग लगाई जाती है। होलिका की चिताग्नि से छिटकती ये चिंगारियाँ हर वर्ष विजय का उत्सव मनाती हैं। भक्ति की शक्ति पर विजय! विनम्रता की अहं पर विजय! सदाचार की दुराचार पर विजय!
ब्रह्मज्ञान की काम-वासना पर विजय!

तमिलनाडु आदि दक्षिण भारत के राज्यों में होली एक अन्य तर्ज पर मनाई जाती है। परन्तु इस तर्ज में भी एक महान इतिहास और संदेश दर्ज है। वह है, कामदहन प्रसंग का! प्रसंग के अनुसार देवतागण भगवान शिव की अखण्ड समाधि को भंग करने की योजना हेतु कामदेव का चयन करते हैं|

कामदेव सुन्दर पुष्पों का मुकुट पहन कर, ईख (गन्ने) का धनुष बनाकर समाधिस्थ शिव पर बाण चला देते हैं। बाण के हृदय भेदते ही महादेव क्रोधित हो जाते हैं। वीतरागी शंकर का तीसरा नेत्र खुलता है और उससे प्रचण्ड अग्नि प्रस्फुटित होती है, जो कामदेव को भस्मसात् कर डालती है। इसी मर्मभेदी इतिहास के आधार पर दक्षिण भारत में होली ‘काम-विलास’ या ‘काम-दहनम्’ के नाम से मनाई जाने लगी। यह दक्षिणी होली भी साधना की जीत की प्रतीक है। जब एक साधक ब्रह्मज्ञान की दीक्षा प्राप्त करता है, तो सद्गुरु कृपा से उसका तृतीय नेत्र प्रकट हो उठता है। फिर निरंतर ध्यान-साधना करने पर काम-वासना के दंश उसे विचलित नहीं करते। साधक वासना के सभी वेगों को अपनी साधना के बल पर नष्ट कर डालता है। उसके भीतर ‘काम’ नहीं, केवल प्रेम, ममता या सुखद संवेदनाएँ ही रह जाती हैं।

होली- राक्षसी अहंता पर बालवत् सरलता की विजय!
यह विलक्षण गाथा भविष्यपुराण में पढ़ने को मिलती है। राजा रघु के राज्य में धुंधि नाम की एक राक्षसी रहती थी, जो वरदान के कारण अजेय हो गई थी और आततायी भी। उससे छुटकारा पाने हेतु राजा के कुलपुरोहित ने सुझाव दिया कि सरल-हृदय बालकों से सामूहिक यज्ञ करवाया जाए। कहा जाता है कि उनके समस्वर में मंत्रोच्चारण करने और तेज-तेज करतल ध्वनि के कारण राक्षसी धुंधि नगर छोड़कर पलायन कर गई। ऐतिहासिक गणना के हिसाब से यह घटना होली के दिन ही घटी। अतः इसे होलिकोत्सव से जोड़ दिया गया।

इसी प्रकार माना जाता है कि विष-मिश्रित दूध पिलाने आई पूतना का वध भी बाल-कन्हैया ने इसी दिन किया था। अतः ब्रज के कई स्थानों पर होलिकोत्सव में पूतना का पुतला जलाने की भी परम्परा है।

होली- तप्त अग्नि की कीटाणुओं पर विजय!
अंत में होलिका-दहन का एक वैज्ञानिक लाभ भी जान लेते हैं। यह पर्व सर्दियों की विदाई-बेला में आता है। इस वेला में, वातावरण व हमारी देह पर तरह-तरह के बैक्टीरिया अथवा कीटाणुओं की वृद्धि हो जाती है।

ऐसे में, जब होलिका जलाई जाती है, तो ताप 145oF तक पहुँच जाता है, जो इन कीटाणुओं को नष्ट करने में अहम् भूमिका निभाता है। यह प्रकृति का नियम है कि वह तपाने के बाद शीतल फुहारें देती है। होली भी इसी प्राकृतिक लीला को दोहराती है। इसीलिए होलिका-दहन से अगले दिन जल-वर्षा करने और शीतल चंदन, अबीर आदि उड़ाने की परम्परा है। यही भारतवर्ष की होली है- इतनी ऊँची, इतनी गहरी! दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से सभी पाठकों को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ !