बडऩगर:गजनवी से युद्ध के समय मां चामुंडा बनी थीं राजा जगदेव की सहायक

*दिनभर में तीन रूप में भक्तों को दर्शन देती हैं मां

*करीब 200 साल पुराना है मां चामुंडा का मंदिर

*मोहम्मद गजनवी के नाम पर पड़ा गांव का नाम

*शेषनाग धारण किए भगवान गणेश की इकलौती मूर्ति

*माता के अंगरक्षक माने जाते हैं बाबा हनुमान

प्रशांत व्यास . बडऩगर/मालवा निमाड़ क्षेत्र में कई देवी मंदिर अपनी विशेषताओं और चमत्कारों के कारण श्रद्धालुओं की प्रबल आस्था का केंद्र हैं। ऐसा ही एक ऐतिहासिक मंदिर बडऩगर तहसील के ग्राम गजनीखेड़ी में मां महिषासुर मर्दिनी चामुंडा माता का है। कहते हैं यह मंदिर करीब 2000 साल पुराना है।
इस मंदिर के इतिहास के बारे में बताया जाता है कि मातारानी दिन में तीन रूप धारण करती हैं। सुबह के समय बाल रूप, दोपहर में युवा और शाम को वृदावस्था रूप में दर्शन देती हैं। मातारानी की मूर्ति के पास शेषनाग धारण किए हुए है। यह मूर्ति दुनिया में केवल दो ही हैं। दूसरी मूर्ति नेपाल में है। इस गांव का नाम गजनीखेड़ी इसलिए पड़ा कि मोहम्मद गजनवी ने चामुंडा के मंदिर पर आक्रमण किया था। इसके अवशेष मंदिर के पीछे आज भी देखे जा सकते हैं। यह मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन है। मंदिर के पास ही मोहम्मद गजनवी की सेना का पड़ाव स्थल भी था।

ऐसी है मंदिर से जुड़ी कथा…
धार के पंवार वंश के राजा जगदेव पंवार यहां रोज मां के दर्शन के लिए आते थे। उस समय मुगल शासक मोहम्मद गजनवी भारत के लोगों पर जुल्म कर रहा था। एक दिन उसकी सेना का पड़ाव मंदिर के पास होता है। मंदिर की आभा और वैभव देख वह प्रभावित होता है और मंदिर पर आक्रमण कर देता है। उसी समय राजा जगदेव सिंह भी मंदिर में उपस्थित रहते हैं। राजा जगदेव गजनवी से युद्ध करते हैं लेकिन उन पर संकट मंडराने लगता है। इस स्थिति में मां उन्हें दर्शन देती हैं और कहती हैं राजन तुम उसका सामना करो और पीछे मुड़कर मत देखना। जितने रूप में मातारानी के थे उतने रूप उन्होंने राजा जगदेव के बनाए। फिर राजा और गजनवी के बीच भंयकर युद्ध हुआ। इसमें मंदिर क्षतिग्रस्त हो गया। इसके कई अवशेष आज भी मंदिर के पीछे देखे जा सकते हैं।

भगवान श्रीगणेश की ऐसी मूर्ति देश में केवल एक


मंदिर की अपनी कई विशेषताएं हैं। मातारानी की मूर्ति के समीप भगवान श्रीगणेश की मूर्ति है जो शेषनाग पर विराजित हैं। इस प्रकार की मूर्ति देशभर में यहीं है। इसके अलावा ऐसी मूर्ति नेपाल में स्थित है। कहा जाता है मंदिर के प्रमुख द्वार पर बने भगवान हनुमान के दर्शन करने के बाद ही माता के दर्शन का पुण्य लाभ मिलता है क्योंकि भगवान हनुमान उनके अंगरक्षक माने जाते हैं। मंदिर के सामने बने हाथी के ऊपर सिंह विराजित हैं।

भागवत पुराण के अनुसार जब महिषासुर से मां युद्ध कर रही थीं तब उनके पास बड़े-बड़े हाथी थे और मां के पास सिर्फ एक शेर था परंतु उनका शेर इतना क्रोधित था कि वह हाथी के ऊपर चढ़ गया। इसके बाद उन्हें गज सिंहवाहिनी कहा जाता है। मंदिर की एक मुख्य प्रमुख विशेषता यह भी है कि यहां देवी मां के दिन में तीन रूपों में दर्शन देती है। सुबह बाल रूप में, दोपहर तरुण रूप में और रात्रि में प्रौढ़ावस्था में दर्शन होते हैं।

यह हैं मंदिर से जुड़ी प्रमुख मान्यताएं
यहां भक्तों की हर मुराद पूरी होती है। यहां मां की कृपा से संतान प्राप्ति होती है। जिन लोगों को विवाह संबंधित समस्या होती है वे मंदिर में उल्टा स्वस्तिक बनाते हैं। मनोकामना पूरी होने पर पति-पत्नी दोनों को यहां आकर उस स्वस्तिक को सीधा करना होता है। कहते हैं यहां पहले तंत्र साधना होती थी। प्राचीनकाल में मंदिर के समीप बना श्मशान घाट तांत्रिकों का केंद्र था परंतु एक समय के बाद यहां नकारात्मकता बढऩे लगी। मंदिर में सकारात्मकता बनाने के लिए मंदिर के नीचे 10 महाविद्या व ऊपर नवदुर्गा की स्थापना की गई।