बुद्धि से नहीं, हृदय से देखो संसार

पहला सूत्र: सिर विहीन होने का प्रयास करो। स्वयं के सिर विहीन होने की कल्पना करो। सुनने में यह अजीब लगता है परंतु यह बहुत ही महत्वपूर्ण साधनाओं में से एक है। इसका प्रयोग करो, तब तुम जानोगे। प्रारंभ में तो यह बड़ा अटपटा और अजीब लगेगा लेकिन धीरे-धीरे तुम हृदय में स्थित हो जाओगे।
एक नियम है। शायद तुमने देखा हो, जो व्यक्ति दृष्टिहीन है, उसके कान अधिक तत्पर, अधिक संगीतमय होते हैं। क्यों? जो ऊर्जा सामान्यत: आंखों से बहती है, अब उनसे तो बह नहीं सकती, तो वह एक भिन्न मार्ग चुन लेती है: वह कानों से बहने लगती है।

तो इस प्रयोग को, सिर विहीन होने के प्रयोग को, करके देखो। अचानक तुम एक अद्भुत बात अनुभव करोगे: ऐसा होगा जैसे पहली बार तुम हृदय पर आए। सिर विहीन होकर चलो। ध्यान के लिए बैठो, अपनी आंखें बंद करो और बस यही अनुभव करो कि सिर नहीं है। महसूस करो, मेरा सिर विलीन हो गया है।

धीरे-धीरे तुम्हें लगेगा कि सिर सच में ही विलीन हो गया है। और जब तुम्हें लगेगा कि सिर विलीन हो गया है, तो तुम्हारा केंद्र हृदय पर आ जाएगा-तत्क्षण! तुम संसार को हृदय से देखोगे, बुद्धि से नहीं। जब पहली बार पश्चिम के लोग जापान पहुंचे तो वे विश्वास नहीं कर पाए कि जापानी लोग पारंपरिक रूप से सदियों से यह सोचते रहे हैं कि वे पेट से सोचते हैं!
यदि तुम किसी जापानी बच्चे से पूछो कि तुम्हारा सोच-विचार कहां होता है? तो वह अपने पेट की ओर इशारा करेगा। सदियां बीत गई हैं और जापान सिर के बिना जीता रहा है। तो सिर विहीन होने का प्रयास करो। अपने स्नान गृह में दर्पण के सामने खड़े होकर ध्यान करो।

अपनी आंखों में गहरे झांको और महसूस करो कि तुम हृदय से देख रहे हो। धीरे-धीरे हृदय-केंद्र सक्रिय हो जाएगा। और जब हृदय सक्रिय हो जाता है, तो तुम्हारे पूरे व्यक्तित्व,पूरी संरचना, पूरे तौर-तरीके को बदल डालता है क्योंकि हृदय का अपना अलग मार्ग है।

प्रेम बुद्धि से नहीं हो सकता। अधिक प्रेमपूर्ण हो जाओ! यही कारण है, जब कोई प्रेम में होता है, उसकी बुद्धि छूट जाती है। लोग कहते हैं कि वह पागल हो गया है।यदि तुम प्रेम में पड़ो और पागल न हो जाओ, तो तुम वास्तव में प्रेम में नहीं हो। बुद्धि तो खोनी ही होगी। यदि बुद्धि अप्रभावित रहे और यथावत कार्य करती रहे, तो प्रेम संभव नहीं है, क्योंकि प्रेम के लिए तो हृदय के सक्रिय होने की जरूरत है, बुद्धि की नहीं।

ओशो