ब्रह्मज्ञान को पाकर साधक ब्रह्माण्ड रूपी पावरहाउस से जुड़ता है

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा प्रत्येक माह की भांति दिव्य धाम आश्रम में मासिक सत्संग समागम का आयोजन किया गया जिसमें अनेकों भक्त श्रद्धालुओं ने भाग लियाI कार्यक्रम का शुभारम्भ आरती एवं सुमधुर भक्त संकीर्तन द्वारा किया गयाI तदोपरांत श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य एवं शिष्याओं द्वारा भक्ति से ओतप्रोत विचारों को सत्संग के माध्यम से प्रदान किया गयाI अपने प्रवचनों में साध्वी जी ने बताया की भक्ति का मार्ग खांडे की धार के समान हैI अतः इस मार्ग में चलने के लिए एक साधक को हर पल हर शण सजग रहने की जरुरत होती हैI सतगुरु के पवित्र सान्निध्य में सुख, शांति, आनंद और दिव्यता का अनुभव होता है| इसी श्रृंखला में हर माह गुरु कृपा के माध्यम से प्रसारित प्रेरणादायक सत्संग विचार, भक्ति संगीत शिष्यों में निःस्वार्थ सेवा की भावना को दृढ़ करती है ताकि वे विश्व शांति के महान मिशन की ओर अग्रसर हो सकें| श्री आशुतोष महाराज जी के दिव्य सन्देशों ने शिष्यों को महान व अनुकरणीय चरित्रों का आकार दिया है जिनकी ओर आस लगाए आज दुनिया निहार रही है| ब्रह्मज्ञान को पाकर साधक ब्रह्माण्ड रूपी पावरहाउस से जुड़ जाते हैं जिसके माध्यम से वे ब्रह्मांडीय ऊर्जा को अपनी ओर खींचते हैं जिस कारण वह सभी आयामों पर पूर्णता प्राप्त करने में सक्षम होते हैं।

एक शिष्य का जीवन एवं उसके प्राण होते है उसके गुरुI वह किसी भी परिस्थिति में अपने गुरुदेव से विलग होकर रहने की कल्पना नहीं करताI इतिहास में ऐसे असंख्य सच्चे शिष्य हुए है जिन्होनें दृढ़ता से गुरु भक्ति के मार्ग पर चलते हुए हर विपत्ति का डटकर सामना किया तथा जीवन में ऐसे संघर्षों में भी गुरु के दामन को छोड़ना स्वीकार नहीं कियाI यदि एक शिष्य हर अवस्था में धैर्य और आत्मविश्वास बनाए रखता है, निरंतर गुरु चरणों में प्रार्थना करता है तो उसे इस मार्ग से कोई नहीं डिगा सकता।

अतः हमें भी सदैव गुरु वचनों के प्रति श्रद्धा और विश्वास रखना चाहिए, संदेह नहीं। संदेह हमारी भक्ति को इस तरह से समाप्त करता है, जैसे खटाई की एक बूँद बड़े से बड़े पात्र में रखे दूध को ख़राब कर देती  है। और विश्वास वह जल है, जो हमारे भक्ति के उद्यान को सदैव हरा भरा रखता हैI एक शिष्य को सदैव यह स्मरण रहना चाहिए कि जब तक वो गुरु चरणों से जुड़ा है और उनके द्वारा निर्मित ज्ञान जहाज में बैठा है, वह सुरक्षित है, चाहे विपरीत परिस्थितियों के कितने भी तूफ़ान आ जाएI किन्तु यदि शिष्य इसे त्यागने का प्रयास करेगा तो संसार रुपी भवसागर में डूब जाएगाI

स्वामी जी ने बताया कि एक शिष्य के चिंतन में सदैव अपने गुरु की प्रसन्नता होनी चाहिए और हमारे गुरुदेव की प्रसन्नता केवल इसी बात में निहित है कि उनका प्रत्येक शिष्य भक्ति मार्ग में निरंतर गति से चलते रहे और संगठित रहते हुए सम्पूर्ण विश्व कल्याण में अपना योगदान अर्पित करें! भक्ति, प्रेम एवं चरैवेति की धुन से सजे इस कार्यक्रम का सबने भरपूर लाभ उठायाI