भारतीय नववर्ष, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ऐतिहासिक गौरव का प्रतीक!

क्या आप जानते हैं, भारत की मिट्टी से उठती सौंधी खुशबू, आकाश के नक्षत्र-तारे, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आपको इस महीने की 18 तारीख को नववर्ष की बधाइयाँ दे रहा है? भारत का गौरवमयी अतीत, हमारे महामहिम मनीषी, पूर्वज और उनकी ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न धरोहरें- सभी इसी दिन हम पर नववर्ष के आशीष लुटा रहे हैं! भारतीय विक्रम-संवत् के अनुसार इस चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा याने 18 मार्च को ही हमारा और आपका अपना स्वदेशी नया साल शुरु हो रहा है। इस वर्ष 2018 ‘विलंबी’ नाम का संवत्सर रहेगा…. ईमानदारी से बताइए, क्या आपको इस नववर्ष के बारे में पता था? यदि नहीं पता था, तो क्या अब जानकारी होने पर आप चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को पहली जनवरी का दर्जा देने व उससे नए साल की शुरुआत मानने को तैयार हैं? और यदि पहले से ही पता था, तो क्या आप इस नव संवत्सर को उसी उत्साह से मनाते हैं, जिस तरह अंग्रेजी नववर्ष को? ये तीन प्रश्न हैं, जिनका उत्तर अधिकतर ‘न’ में ही मिलता रहा है।

पर आगे ऐसा न हो हर भारतीय के मुख से उत्तरस्वरूप ‘हाँ’ निकले- इसी आशा से नववर्ष संबंधी ज्वलंत तर्क और विचार आपके समक्ष रख रहे हैं। वास्तव में, सन् 1752 में, 1 जनवरी को नव वर्ष के रूप में मनाने का प्रचलन अंग्रेजों ने ही भारत में आयात किया और आरोपित कर डाला। इस चलन में हमारी अपनी कोई सेाच-सुधि या इतिहास नहीं है। इसकी जड़ें तो 713 ई. पूर्व रोम के इतिहास में हैं। उस काल में रोमन लोग एक कैलन्डर मानते थे, जिसमें एक वर्ष में 10 महीने हुआ करते थे। परन्तु 47 ईसा पूर्व रोमन शासक जूलियस सीज़र ने इसमें कतिपय बदलाव किए और तब यह ‘जूलियन कैलन्डर’ के नाम से विख्यात हुआ।

इसके बाद सन् 1582 में पोप ग्रेगोरी अष्टम ने इसमें लीप ईयर जोड़ा व कुछ और परिवर्तन किए। तभी से यह कैलन्डर ‘ग्रेगोरियन’ कहलाया और आज पूरे विश्व में अपना प्रभुत्व जमा रहा है। यह कैलन्डर सूर्य पर आधारित है। अतः जितना समय पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करने में लेती है, अर्थात् 365 दिन, 5 घंटे, 48 मिनट, 46 सैकेन्ड- उतने का ही इस कैलन्डर में एक वर्ष प्रतिपादित किया गया। वर्ष का प्रथम दिन रखा गया 1 जनवरी! विडम्बना यह घटी कि अंग्रेजों के कूच कर जाने के बाद भी हम इसी कैलन्डर के संकेतों पर नृत्य करते रहे। पहली जनवरी को ही नववर्ष का उद्घाटन करने लगे। स्वयं अपने संवत्सर और काल गणना को बिसार बैठे। संभवतः आपको यह भी न पता हो कि हमारे भारत का एक निजी कैलन्डर और काल-गणना भी है। भारत की यह कालगणना सबसे प्राचीन व वयोवृद्ध है।

आगे की बात करें, तो ग्रेगोरियन संवत् में महीनों के नामों के पीछे भी मनमर्जी का खेल नज़र आता है। वहीं भारतीय संवत्सर में महीनों के नाम पूर्णतः वैज्ञानिक ढंग से, आकाशीय नक्षत्रों के उदय-अस्त होने के आधार पर रखे गए। यजुर्वेद बताता है-‘सौर मण्डल के ग्रह-नक्षत्रों की चाल और स्थिति पर ही हमारे दिन, माह और साल आश्रित होते हैं।’ वैसे भी, ग्रेगोरियन कैलन्डर में कोई विशेष बात नहीं दिखती। उसका सीमा-क्षेत्र बस इतना ही है कि आप उससे तिथियों, सप्ताहों, माहों और वर्ष का ब्यौरा पा सकते हैं।

परन्तु विक्रमी संवत् का कैलन्डर याने पंचांग एक तरह से आपकी जीवन-सारिणी, एक सशक्त मार्गदर्शक होता है। कारण कि उसमें तिथियों, सप्ताहों, महीनों और वर्ष के अलावा सूर्योदय, सूर्यास्त का समय, सूर्य और चन्द्रमा की गति, नक्षत्रों की स्थिति आदि तथ्यों का भी ब्यौरा दिया गया होता है। इसके अतिरिक्त ग्रेगोरियन कैलंडर में कुछ नौसिखिये पहलू भी दिखाई देते हैं।

जैसे कि अर्धरात्रि को 12:00 बजे घुप्प अंधकार के बीच, जब सारी दिनचर्या ठप्प पड़ जाती है, तब ग्रेगोरियन कैलंडर के हिसाब से नया दिन करवट लेता है। आधी रात को तिथि बदल जाती है! पर वहीं दूसरी ओर, भारतीय संवत् के अनुसार हर सूर्योदय के साथ, जब धरा पर नारंगी किरणें बिखरती हैं, तब नया दिन चढ़ता है। माने सूर्यदेव के दर्शन के साथ ही नए दिन का सुस्वागतम्! ग्रेगोरियन कैलन्डर में 400 वर्षों पहले तक संशोधन होते रहे और आज भी बहुत से सुधारों की आवश्यकता है।

इसके विपरीत विक्रम संवत् ‘सूर्य-सिद्धांत’ द्वारा संचालित है। इस सिद्धांत का गणित एकदम सटीक और त्रुटिहीन है| इस सिद्धांत के अनुरूप यदि सृष्टि के प्रथम दिन से आज तक का आकलन किया जाए तो एक दिन का भी फर्क नहीं मिलता। भारतीय संवत् के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर नवीनता की छटा अपने आप ही प्रत्यक्ष हो जाती है। एक नहीं, अनेक युक्तियाँ इस दिन को वर्ष का पहला दिवस घोषित करती हैं। जैसे-

प्राकृतिक चेतना अंगड़ाई भर उठती है!

चैत्र शुक्ल के आते-आते कड़कती ठंड के तेवर ढीले पड़ चुके होते हैं। बर्फीली हवाएं बसन्त की बयार बन जाती हैं। चैत्र शुक्ल को ऋतुराज का पूरी प्रकृति पर राज हो जाता है। इसी के साथ प्रकृति का कण-कण, नव उमंग, उल्लास और प्रेरणा के संग, अंगड़ाई भर उठता है। यह चेतना, यह जागना, यह गति-यही तो नववर्ष के साक्षी हैं!

सामाजिक चेतना-उत्सवमयी!

वैसे भी देखा जाए, तो चैत्र नक्षत्र के चमकते ही कश्मीर से लेकर केरल तक, उत्सवों के नगाड़े बज उठते हैं। ये सभी उत्सव भारत की सामाजिक चेतना को अपनी थाप पर थिरकाते हैं। ये एक प्रकार से नववर्ष के ही सूचक होते हैं। इसी दिन नवरात्रों का भी शुभारम्भ होता है और भारत भर में माँ जगदम्बा के जयकारे गूँज उठते हैं। अतः चैत्र शुक्ल पर ही भारत की सामाजिक चेतना नववर्ष में प्रवेश करती है।

ऐतिहासिक गौरव का प्रतीक! इतिहास के झरोखों से झांकने पर भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथियों की रानी जैसी दिखती है। भारतीय कालगणना के अनुसार इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि का सूत्रपात किया था। यही कारण है कि इस आदि संवत्सर को भारत के कुछ प्रांतों में ‘युगादि’ अर्थात् ‘युग का आदि’ नाम से भी सम्बोधित किया  जाता है।

यही नहीं, ‘स्मृति कौस्तुभ’ के अनुसार इसी घड़ी में भगवान नारायण ने मत्स्यावतार धारण किया था। यही वह शुभ दिवस था, जब अयोध्या में श्री रामचन्द्र भगवान का राज्याभिषेक हुआ था। युगाब्द संवत् का भी पहला दिन यही है अर्थात् द्वापर में धर्मराज युधिष्ठिर के भी राज्याभिषेक का यही दिवस है। सिख इतिहास के द्वितीय पातशाही गुरु अंगद देव जी व सिंध प्रांत के संत झूलेलाल जी का भी प्रगटोत्सव इसी दिन मनाया जाता है। स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने आर्य समाज की स्थापना इसी शुभमुहूर्त में की थी।

अध्यात्म बल की धनी!

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ‘शुभ मुहूर्त’ इसलिए कहा क्योंकि इस दिन नक्षत्रों की दशा, स्थिति और प्रभाव उत्तम होता है। गणेश्यामल तंत्र के अनुसार पृथ्वी पर नक्षत्रलोक से चार प्रकार की तरंगें गिरती रहती हैं- यम, सूर्य, प्रजापति और संयुक्त। चैत्र शुक्ल को विशेष रूप से प्रजापति और सूर्य नामक तरंगों की बरखा होती है। ये सूक्ष्म तरंगें अध्यात्म बल की बहुत धनी और उत्थानकारी हुआ करती हैं। अतः यदि इस शुभ घड़ी में सुसंकल्पों के साथ नए साल में कदम रखा जाए, तो कहना ही क्या! अब इस समस्त तर्कों के प्रकाश में आप स्वयं निर्णय लें कि हमें किस संवत् पर आश्रित होना चाहिए! किसकी गणनाएँ अधिक विश्वसनीय हैं? किसका नववर्ष का आरम्भ हमारे लिए सच में शुभ और मंगलमय है- वैज्ञानिक, व्यावहारिक, आध्यात्मिक- सभी दृष्टिकोणों से! और ऐसा भी नहीं है कि हमारे लिए भारतीय नववर्ष को मनाना बिल्कुल अव्यावहारिक, पेचीदा और अपनी अलग बीन बजाने जैसा होगा।

यदि जापान अपने परंपरागत ढंग से, अपनी परंपरागत तिथि पर, अपना नववर्ष मना सकता है; यदि म्यांमार अप्रैल के मध्य में अपना नववर्षोत्सव ‘तिजान’, ईरान बसंत ऋतु अर्थात् मार्च में अपना नववर्षोत्सव ‘नौरोज’, चीन चंद्रमाधारित तिथि के अनुसार जनवरी 21-फरवरी 21 के बीच अपना पारंपरिक नववर्षोत्सव, असरीयन, थाई और कंबोडियन लोग अप्रैल में अपने-अपने नववर्ष मना सकते हैं- तो फिर हम भारतवासी अपने स्वदेशी पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को अपना नववर्षोत्सव क्यों नहीं मना सकते?