भौतिकता एक-दूसरे से तोड़ती है पर आध्यात्मिकता हमें जोड़ती है

लोगों के मन में प्राय: एक सवाल उठता है कि आध्यात्मिकता और भौतिकता में क्या फर्क है/ मेरा मानना है कि एक व्यक्ति है, दूसरी वस्तु। लेकिन वस्तु व्यक्ति के लिए है न कि व्यक्ति वस्तु के लिए। व्यक्ति अगर व्यक्ति से प्रेम करना और वस्तु का उपयोग करना सीख ले तो समाज स्वस्थ रहेगा।
पर आज समाज में इसकी परिभाषा बदल गई है। आज व्यक्ति व्यक्ति का उपयोग करता है और वस्तु से प्रेम करता है। इससे उसमें भौतिकवाद की गंध आ रही है। इंसान इंसान न होकर वस्तु बन गया है। व्यक्ति मिटकर पदार्थ बन गया है। पैसा उसके सिर चढ़कर बोल रहा है। जहां देखो, जिससे बात करो, चारो तरफ पैसा… पैसा…पैसा…। मनुष्य आज पैसे के पीछे अंधी दौड़ में पड़ा है।

मेरी मान्यता है कि अब पैसे वालों के बेटे नहीं होते, वारिस होते हैं। ऐसा मैं श्रीमंतों के लिए नहीं कह रहा, पैसे वाले की बात करता हूं। पैसे वालों से मेरा अभिप्राय है जैसे-तैसे, किसी भी तरीके से पैसे वाले बन जाना। अपने शास्त्रों में पुत्र शब्द का भावार्थ बड़ा सुंदर है। जो नर्क से तारे वो पुत्र। जिस पिता ने गलत तरीके से धन एकत्र किया उसके वारिस पिता को तो नहीं ही तारेंगे, खुद का भी कल्याण नहीं कर पाएंगे।

आज हर क्षेत्र में जड़ता फैल रही है, जबकि आध्यात्मिकता में दिखावा नहीं है। इतना ही नहीं आध्यात्मिकता दर्शन को महत्व देता है, प्रदर्शन को नहीं। तीन शब्द महत्व के हैं दर्शन, तत्व दर्शन और अध्यात्म। उसी के कारण भारतीय संस्कृति में विविध प्रकार के दर्शन हमें प्राप्त हुए हैं। योग, सांख्य, वैशेषिक, न्याय, पूर्व मीमांसा, उत्तर मीमांसा, जैन दर्शन और अनेक दर्शन भारतीय संस्कृति में हैं। आज वस्तु से प्रेम के चलते दर्शनवादी मिटकर प्रदर्शनवादी बनते जा रहे हैं।

हमारे यहां चार पुरुषार्थ हैं-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। धर्म का हेतु मोक्ष है, अर्थ नहीं। अर्थ का हेतु धर्म है, काम नहीं। मतलब धन का हेतु ये नहीं कि खाओ, पियो और ऐश करो। जीवन का हेतु तत्व को जानने की इच्छा यानी जिज्ञासा। कोई उस तत्व को परमात्मा, तो कोई ब्रह्म कहता है। तत्व को जानने की प्यास के चलते ही यह जीवन है। सो धर्म का हेतु मोक्ष है, अर्थ नहीं।

आज इंसान मंदिर में जाता है तो वहां भी परमात्मा से धन ही मांगता है। धर्म का हेतु अर्थ बन गया है, मोक्ष नहीं रहा। एक समय ऐसा था, जब लोग धर्म को केंद्र में रखकर व्यापार करते थे। पर आज धर्म व्यापार का रूप ले रहा है। चारों तरफ कीर्ति और प्रदर्शन की जबरदस्त स्पर्धा दिख रही है। समाज को इस जड़ता से कोई बाहर निकाल सकता है तो वह है आध्यात्मिकता। आध्यात्मिकता स्व: के लाभ के साथ समाज को जोड़ती है, जबकि भौतिकता इंसान और समाज को तोड़ती है।