महापौर और अध्यक्ष के बीच तनातनी निगम गलियारों से शहर में बनी चर्चा का विषय

उज्जैन। महापौर मीना जोनवाल और निगम अध्यक्ष सोनू गेहलोत के बीच तनातनी अब निगम गलियारों से निकलकर शहर में चर्चा का विषय बन चुकी है। लोगों का कहना है कि सदन में पूरा बहुमत होने के बाद अध्यक्ष, महापौर शहर का विकास नहीं कर पा रहे हैं। निगम सूत्र बताते हैं कि दोनों नेताओं के बीच तनातनी का मुख्य कारण महापौर द्वारा फाइलों को रोकना और निर्माण कार्यों को अटकाना है।
मुख्यमंत्री की घोषणा में शामिल मोढ़ धर्मशाला से लेकर सत्यनारायण मंदिर तक महाकालेश्वर सवारी मार्ग चौड़ीकरण से तनाव की कहानी प्रारंभ हुई। उक्त क्षेत्र से निगम अध्यक्ष स्वयं पार्षद चुने गये हैं लेकिन महापौर और तत्कालीन आयुक्त आशीष सिंह ने बिना मुआवजे के सवारी मार्ग चौड़ीकरण शुरू किया। इस दौरान लोगों ने क्षेत्रीय पार्षद सोनू गेहलोत का घेराव किया तो उन्होंने शासन के नियम बताकर लोगों को शांत कराया और शीघ्र काम पूरा करने का आश्वासन भी दिया लेकिन आशीष सिंह की पदोन्नति के बाद हुए तबादले के बाद सवारी मार्ग चौड़ीकरण का काम बंद हो गया।

हालांकि निगम अध्यक्ष ने अपने स्तर पर फाइल तलब करवाई और काम शीघ्र शुरू करने के निर्देश अधिकारियों को दिये लेकिन अधिकारियों ने उनके निर्देशों पर अमल नहीं किया। दूसरा मामला सप्त सागर विकास से जुड़ा था जबकि गयाकोटा तीर्थ विकास का मामला तो सार्वजनिक भी हो गया। कुल मिलाकर वर्तमान में नगर निगम का संचालन महापौर बंगले से हो रहा है। निर्माण और भुगतान संबंधी फाईलें पहले बंगले जाती हैं और वहीं से आगे की कार्रवाई का निर्धारण हो रहा है। इसकी शिकायत स्वयं पक्ष और विपक्ष के पार्षद आयुक्त से कर चुके हैं और अब महापौर ने अध्यक्ष को भी उन्हीं पार्षदों की लाइन में खड़ा कर दिया। दोनों नेताओं के बीच तनातनी की शुरूआत भी यहीं से हुई है।

फाइलें बंगले भेजने पर पार्षदों को आपत्ति
नगर निगम की प्रत्येक फाइल महापौर बंगले पहुंचती हैं, संबंधित अधिकारी उक्त फाइलों की जानकारी के लिये स्वयं महापौर के समक्ष उपस्थित होते हैं और लम्बी चर्चा के बाद निर्णय होता है कि काम करना है या नहीं। इस पर नेता प्रतिपक्ष सहित पक्ष के पार्षद भी आपत्ति उठा चुके हैं। पूर्व महापौर रामेश्वर अखंड ने आगर रोड स्थित निगम मुख्यालय में सर्वसुविधा युक्त एमआईसी हॉल का निर्माण कराया था। उसी दौरान अखंड ने कहा था कि आगे से एमआईसी सहित अन्य बैठकें यहीं पर आयोजित होंगी ताकि फाइलों को इधर उधर करने की आवश्यकता नहीं पड़े, लेकिन अखंड के जाने के बाद आज तक एक भी बैठक एमआईसी हॉल में नहीं हुईं। सभी प्रकार की बैठकें महापौर बंगले पर ही आयोजित की जाती है।

दोनों नेताओं को करोड़ों के अधिकार
नगर निगम की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं। पूर्व में भी एफडी तुड़वाकर कर्मचारियों को भुगतान किया गया था। निगम सूत्र बताते हैं कि यदि शासन की करोड़ों की योजनाएं नगर निगम में न आएं तो कर्मचारियों के वेतन भुगतान की समस्या खड़ी हो जाये। वहीं शासन ने महापौर, अध्यक्ष और एमआईसी को करोड़ों के कार्यों के अधिकार दिये हुए हैं। इन्हीं अधिकारों के अंतर्गत दोनों नेता कार्यों की स्वीकृति भी देते हैं लेकिन महापौर को छोड़कर अध्यक्ष या पार्षदों द्वारा दी जा रही स्वीकृतियों की फाइलों को भी बंगले बुलवाया जा रहा है।