महावीर हनुमान भक्ति एवं समर्पण की प्रतिमूर्ति है

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से आप सभी को हनुमान जयंती की शुभ कामनाएँ! लक्ष्य था, माँ सीता की खोज अर्थात् भक्ति की प्राप्ति! अंगद, जाम्बवंत, नल-नील और अन्य सभी श्रेष्ठ वानर बड़े उत्साह से मंज़िल की ओर बढ़ रहे थे। रास्ते में जब कभी राक्षस मिलता तो एक ही मुक्के में वे उसे मार डालते। और जब कोई मुनि मिलते तो सब उन्हें घेर लेते और फिर प्रार्थना करते हुए पूछते कि आखिर भक्ति रूपी सीता तक कैसे पहुँचा जाये? निःसंदेह, आत्मा के उत्थान के लिए जब जीव निकलता है, तो उसे दुष्प्रवृत्तियों रूपी राक्षसों को मार गिराना चाहिए और जब भी कोई संत मिले तो उनसे आगे का मार्गदर्शन ले लेना चाहिए। लेकिन भक्ति की डगर बड़ी विचित्र है। दरअसल, जब कुछ समय बीतने पर भी जीव को लक्ष्य हासिल होता दिखाई नहीं देता, तो वह व्याकुल होने लगता है।

संशय के वनों में भटकने लगता है। थकान उस पर हावी होने लगती है। सीता जी की खोज में निकले वानर-दल के साथ भी तो कुछ ऐसा ही घटा था| प्यास के कारण मानो सभी के प्राण निकलने लगे। सब पर थकावट भी हावी होने लगी। लेकिन इसी वानर-दल में प्रभु का एक ऐसा सेवक भी था, जिसे न तो प्यास ही लगी और न ही थकान हुई। जी हाँ, वे थे हनुमान जी! ‘ऐसा क्यों?’, किसी जिज्ञासु ने हनुमान जी से ही पूछ लिया। श्री हनुमान बोले, ‘भईया, पहले आप मेरे एक प्रश्न का उत्तर दीजिए।’ जिज्ञासु-पूछिए! हनुमान जी- एक व्यक्ति कड़ी धूप में चल रहा है और दूसरा ठंडी छाया में।

तो बताओ, कौन पहले थकेगा? जिज्ञासु- निःसंदेह, धूप में चलने वाला। हनुमान जी- उस पर से जो व्यक्ति छांव में चल रहा है, उसके मुख में मिश्री भी है। वहीं धूप में चलने वाले का मुख खाली है। तो बताओ, कौन प्यास से व्याकुल होगा? जिज्ञासु- स्वाभाविक सी बात है, जिसके मुख में मिश्री नहीं है। हनुमान जी- बस यही दुर्भाग्य मेरा नहीं है।

एक तो मैं शीतल छाया में चल रहा हूँ और दूसरा, मेरे मुख में मिश्री भी है। इसीलिए, न मुझे थकान हुई और न ही प्यास लगी। जिज्ञासु ने भी कोई कच्ची गोलियाँ नहीं खेली थीं। वह भी पूरा जानकार था। वह जानता था कि घने जंगल में पेड़ों की छाया तले तो सभी वानर थे। फिर हनुमान जी के पास ऐसी कौन-सी विशेष छाया थी और अन्य वानर कौन-सी धूप में थे? पूछा तो हनुमान जी मुस्कुरा पड़े और बोले-‘शायद तुम्हें नहीं पता कि माँ सीता की खोज के अभियान पर जाने से पहले हम प्रभु का आशीर्वाद लेने गए थे।

तब प्रभु राम ने मेरे सीस पर अपने दिव्य हस्तकमल रखे थे| जिज्ञासु- तो इससे फिर क्या हुआ? हनुमान जी- बस, उसके बाद कभी मुझे लगा ही नहीं कि वे कृपा-हस्त मेरे सीस पर नहीं। मुझे तो अभी भी उन दिव्य कर-कमलों की छाया प्रत्यक्ष अनुभव हो रही है। लेकिन शायद दूसरे वानर-भाई अपने पुरुषार्थ के सहारे चल रहे हैं। अब पुरुषार्थ करोगे, तो तन गरमी तो छोड़ेगा ही न! बस यही कारण है कि पेड़ों की छाया में भी वे धूप महसूस कर रहे हैं। जिज्ञासु- वाह! बहुत सुन्दर! लेकिन हनुमान जी, वो आपके मुख में मिश्री कैसी है, जो एक महीने तक खत्म नहीं हुई? हनुमान जी- एक महीना तो क्या, वह मिश्री तो अनंत काल तक भी खत्म नहीं होती। जिज्ञासु- अच्छा…! ऐसी कौन-सी अद्भुत मिश्री है? हनुमान जी- जानते हो, मेरे सीस पर हाथ रखने के बाद प्रभु श्री राम ने मुझे क्या दिया था? जिज्ञासु-क्या?? बताइये न! हनुमान जी- मुझे उन्होंने अपनी मुद्रिका दी।

हालांकि मुद्रिका को मैं कपड़े में लपेट कर रख सकता था या संभालने के लिए अपनी अंगुली में ही धारण कर सकता था। लेकिन जैसे ही मैंने देखा कि उस पर तो ‘राम’ लिखा है, मैंने झट वह मुख में रख ली। जिज्ञासु (हैरानी से)- वह क्यों? हनुमान जी- क्योंकि ‘राम’ तो मेरे प्रभु का नाम है, मेरे परम गुरुदेव का नाम है। और उनका नाम तो हमेशा मेरे मुख में रहना चाहिए न! आठों याम मुझे उन्हीं का तो नाम-स्मरण करना है। बस जैसे ही वह ‘राम’ नाम की मुद्रिका मैंने मुख में रखी, तो वह ‘प्रभु नाम’ मुझे मिश्री की मिठास देने लगा और मुझे प्यास ही नहीं लगी। शास्त्र भी तो यही कहते हैं कि प्रभु का नाम रोम-रोम में मिश्री का रस घोल देता है। श्री हनुमान जी ने अपने दिव्य चरित्र द्वारा कितना प्यारा सूत्र दिया! निःसंदेह, जब-जब हम केवल अपने पुरुषार्थ के बल पर सेवा करते हैं, तो गुरु की छत्रछाया का अनुभव ही नहीं कर पाते। थकान से शरीर टूटने लगता है।

पर जब कभी गुरुदेव को समर्पित होकर सेवा करते हैं, तो अवश्य यह महसूस होता है कि गुरु महाराज जी के दिव्य हस्त कमल हमारे सीस पर छाया कर रहे हैं। वे सदैव कष्टों की धूप से हमें बचा रहे हैं। साथ ही, सेवा में बढ़ते हुए दिव्य नाम का निरंतर सुमिरन करके तो देखें, इतना मिठास अनुभव होगा कि मिश्री की मिठास भी आप भूल जाएँगे। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से सभी पाठकों को हनुमान जयंती की शुभ कामनाएँ!