मानसिकता बदले तो रुकेगी कन्या भ्रूण हत्या – साध्वी आस्था भारती

गुरुग्राम, हरियाणा में दिनांक 15 से 21 अप्रैल 2018 तक ‘श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ’ का भव्य व विशाल आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्ठम दिवस में भगवान की अनन्त लीलाओं में छिपे गूढ़ व आध्यात्मिक रहस्यों को कथा प्रसंगों के माध्यम से उजागर करते हुए ‘श्री आशुतोष महाराज जी’ की शिष्या भागवत भास्कर महामनस्विनी विदुषी सुश्री आस्था भारती जी ने उद्धव प्रसंग एवं रुक्मिणी विवाह को प्रस्तुत किया।

कथा व्यास साध्वी आस्था भारती जी ने कृष्ण के मथुरा चले जाने पर गोपियों की विरह वेदना का हृदय विदारक वर्णन किया। गोपियों के आर्तक्रंदन से व्याकुल हुए श्री कृष्ण ने अपने मित्र उद्धव को संदेश देकर वृंदावन भेजा। उद्धव जी ने सोचा कि वह गोपियों की प्रेम पिपासा को ज्ञान के जल से शांत करने का प्रयास करेंगे। परन्तु उद्धव जिस ज्ञान का संदेश देना चाहते थे, वह तो केवल बाहरी और शाब्दिक था। गोपियों के सरल, निश्चल और अथाह प्रेम से कोसों दूर।

जिस शब्दों के ज्ञान से वह गौरवान्वित थे, उन्हीं शब्दों के जाल में खुद ही फंस कर रह गए। क्योंकि प्रेम बाहरी नहीं, आंतरिक अवस्था है। श्री कृष्ण ने गोपियों को उनके घट में ही अपने ईश्वरीय रुप का दर्शन करवाया। इसी कारण से उनकी हृदय तारें सदैव श्री कृष्ण से जुड़ी रही। वह कण-कण में अपने कान्हा का दर्शन किया करती थीं। एक तरफ भोली-भाली गोपियाँ जिन्हें विद्वानों की भाषा का तनिक भी ज्ञान नहीं था, प्रेम की पराकाष्ठा को छू गईं।

तो दूसरी ओर विद्वान उद्धव प्रेम के पाठ को नहीं समझ पाए। प्रेम विद्वानों की पोथियों में नहीं अपितु भक्तों के भावों में स्वयं ही प्रदर्शित होता है। इसलिए हर युग मे जब-जब भी वह परमात्मा आया, प्रेम के पुजारियों ने उन्हें सहजता से पहचान लिया। केवट, शबरी जैसे भक्त इसका स्पष्ट उदाहरण हैं। कथा के अंतिम क्षणों में कथा व्यास ने रुक्मिणी विवाह के प्रसंग का उल्लेख किया। जिस प्रकार द्वापर में रुक्मिणी के अधिकारों का हनन हो रहा था उसी प्रकार आधुनिक समाज में भी नारी की स्थिति अत्याधिक दयनीय व शोचनीय बन चुकी है। नारी उत्पीड़न का सबसे भयावह रूप है- कन्या भ्रूण हत्या। इस व्याधि को समाज से खत्म करने के लिए दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा ‘संतुलन’ नामक प्रकल्प चलाया जा रहा है।

जिसमें लोगों को लिंग समानता के महत्व से अवगत करवाकर उनकी इस रुढ़िवादी मानसिकता को ब्रह्मज्ञान के विज्ञान द्वारा बदलने का सफल प्रयास किया जाता है। कथा व्यास ने बताया कि Human mind is the basis of every action इसीलिए एक व्यवस्थित समाज की स्थापना ब्रह्मज्ञान से दीक्षित सृदृढ़ व्यक्तियों द्वारा ही संभव है। साथ ही साथ उन्होंने रुक्मिणी रूपी जीवात्मा का अपने प्रभु प्रियतम के प्रति विरह दर्शाया।

कैसे इस आत्मा की पुकार पर वह परम आत्मा प्रभु उसे समस्त बंधनॉन से स्वतंत्र कर अपने कभी न टूटने वाले प्रणय- सूत्र मेंबांध लेते हैं। इस कथा की मार्मिकता व रोचकता से प्रभावित होकर अपार जनसमूह के साथ-साथ शहर के विशिष्ट नागरिक भी इन कथा प्रसंगों को श्रवण करने के लिए पधारे। ‘श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ’ में भाव विभोर करने वाले मधुर संगीत से ओत-प्रोत भजन संकीर्तन को श्रवण कर भक्त श्रद्धालु मंत्र मुग्ध होकर झूमने को मजबूर हो गए।