मुश्किलों से डरें नहीं, उनका समाधान ढूंढें

एक घर के पास काफी दिन से एक बड़ी इमारत का काम चल रहा था। प्रतिदिन वहां मजदूरों के छोटे-छोटे बच्चे एक दूसरे की शर्ट पकड़कर रेल-रेल का खेल खेलते थे।

ऐसा कई दिन चलता रहा, एक सज्जन रोज उन बच्चों को खेलते हुए देखते थे। एक दिन उन्होंने कौतुहल से गार्ड बनने वाले बच्चे को पास बुलाकर पूछा कि वह प्रतिदिन गार्ड ही क्यों बनता है? कभी इंजन, डिब्बा बनने की इच्छा नहीं होती?

इस पर वह बच्चा बोला कि बाबूजी, मेरे पास पहनने के लिए कोई शर्ट नहीं है, जिसके चलते उसके पीछे वाले उसके कैसे पकड़ेंगे और उसके पीछे कोई खड़ा कैसे होगा। इसीलिए मैं रोज गार्ड बनकर ही खेल में हिस्सा लेता हूं।

ये बोलते समय हालांकि उस बच्चे की आंखों में पानी दिखाई देने लगा लेकिन वह छोटा सा बच्चा उन सज्जन को एक बहुत बड़ा पाठ पढ़ा गया। यानी किसी का भी जीवन कभी भी परिपूर्ण नहीं होता, उसमें कोई न कोई कमी जरूर रहती है। वह बच्चा मां-बाप से गुस्सा होकर रोते हुए बैठ सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और उसने परिस्थितियों का समाधान ढूंढा।

कहानी से सीख 

हम कितना रोते हैं, कभी अपने सांवले रंग के लिए, कभी छोटे कद के लिए, कभी पड़ोसी की कार, कभी पड़ोसन के गले का हार, कभी अपने कम नंबर, कभी अंग्रेज़ी, कभी नौकरी आदि लेकिन हमें उससे बाहर आना पड़ता है। ये जीवन है… इसे ऐसे ही जीना पड़ता है।