रख हौसला वो मंज़र भी आएगा, प्यासे के पास चलकर समंदर भी आएगा

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से दिव्य धाम आश्रम, दिल्ली में मासिक भंडारे का कार्यक्रम आयोजित किया गया| जिसमें संस्थान के संस्थापक एवं संचालक गुरुदेव सर्व श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य एवं शिष्याओं ने भक्ति पथ पर निरंतर बढ़ने के लिए जिज्ञासुओं को प्रेरणादायक विचारों एवं भक्तिपूर्ण भजनों द्वारा प्रेरित किया| श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य स्वामी अदित्यानंद जी एवं स्वामी प्रदीपानंद जी ने अपने विचारों में यह बताया कि महत्वपूर्ण यह नहीं कि एक मनुष्य का जन्म कब हुआ और वह कब मृत्यु को प्राप्त हुआ| बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि इस अन्तराल के भीतर उसने क्या किया| अर्थात जन्म और मृत्यु के बीच जो मनुष्य को समय मिला, जिसे हम जीवनकाल कहते हैं, उस समय का उसने किस प्रकार एवं कितना सदुपयोग किया| परमात्मा की बनाई इस सृष्टि में गुण भी हैं और अवगुण भी| पर एक साधक केवलमात्र गुणों को धारण करता है और अवगुणों का परित्याग कर देता है|

इसलिए आइए, जानते हैं कि वे कौन-कौन से गुण हैं जो हमें वास्तव में सच्चे गुरु का सच्चा शिष्य बनाते हैं| सबसे पहला गुण है सकारात्मकता| एक शिष्य हमेशा सकारात्मक विचारों से परिपूर्ण होता है| वह नकारात्मकता में भी सकारात्मकता ही देखता है| जेम्स एलन अपनी किताब में लिखते हैं – ‘मनुष्य का मन एक बगीचे की तरह होता है|

अगर आप उसमें सुंदर फूल नहीं उगाएँगे, तो खरपतवार खुद ही उग जाएगी|’ कहने का भाव कि यदि आप सकारात्मक विचारों की खेती नहीं करते, तो नकारात्मक विचार स्वतः ही उगकर आपको नष्ट कर देंगे| एक सच्चे शिष्य का क्या जज़्बा होता है, उसे विख्यात लेखक इमर्सन ने बखूबी लिखा – ‘यदि मुझे नर्क में रखा जाए, तो मैं अपने सद्गुणों के कारण वहाँ भी स्वर्ग बना दूँगा|’ ऐसी होनी चाहिये एक शिष्य की सकारात्मकता! दूसरा गुण है कर्मठता| यूरोप के एक दार्शनिक हुए हैं – हर्बर्ट स्पेंसर|

उन्होंने जीवन के दो आयाम बताए| पहला– जीवन की लम्बाई| दूसरा- जीवन की चौड़ाई| जीवन की लम्बाई का मतलब व्यक्ति की आयु से है| एक मनुष्य जितने समय के लिए जीता है, वह उसके जीवन की लम्बाई है| सभी चाहते हैं कि उनका जीवन लम्बा हो यानी वे दीर्घायु हों| पर क्या कभी सोचा है कि हम लम्बा जीवन क्यों चाहते हैं? इसीलिए कि हम अपनी कामनाओं, इच्छाओं को पूर्ण कर सकें| मात्र ऐन्द्रिक सुख को ही आज का इंसान अपने जीवन का आधार मानता है| परन्तु ऐसे जीवन को महापुरुषों ने पशुवत जीवन की संज्ञा दी| इसलिए केवल लम्बी आयु जीवन का आदर्श नहीं है| जीवन का दूसरा आयाम, जो कि चौड़ाई  है, वह अधिक महत्वपूर्ण है| चौड़ाई यानी इस जीवन अवधि में आपने अपना कितना विस्तार किया| अपने मन, चित्त और आत्मा का कितना उत्थान किया| कितना सक्रिय, कर्मशील, मेहनती, ईमानदार और नेकी भरा जीवन व्यतीत किया|

एक शिष्य इस बात को हमेशा स्मरण रखता है| वह हनुमान जी जैसी कर्मठता, सजगता को धारण करने का प्रयास करता है| उसके जीवन में न आलस्य होता है, न प्रमाद! न वह रोगी होता है, न निर्बल| न वह भीरू होता है, न लापरवाह! गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी अक्सर कहते हैं कि दृढ़ निश्चयी और संकल्पवान व्यक्ति तूफानों के रुख को भी बदलने की क्षमता रखता है| ऐसे दृढ़ निश्चयी साधक विपरीत परिस्थितियों से घबराते नहीं, क्योंकि वे जान जाते हैं कि विपत्तियों का जीवन में आना ‘पार्ट ऑफ लाइफ’ है और उन विपत्तियों में भी मुस्कुराते हुए शांति से बाहर निकल आना ‘आर्ट ऑफ़ लाइफ’ है| एक सच्चे शिष्य की भी अपने गुरु के चरणों में यही प्रार्थना होती है – “गुरुवर तुम्हारे पावन पथ पर, हो ये अर्पित जीवन सारा|

बढ़े चलें हम रुके कभी न, हो ये दृढ़ संकल्प हमारा||” तीसरा गुण है धैर्य| शिष्य के भीतर अथाह धैर्य होना चाहिए क्योंकि धैर्यवान व्यक्ति ही अपने जीवन में जीत को हासिल करता है, सफलता को प्राप्त करता है| मुझे स्मरण है, एक बार गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी ने कहा था – ‘गुरु शिष्य के धैर्य की परीक्षा नहीं लेते, बल्कि असीम धैर्य की परीक्षा लेते हैं| इसलिए परम धैर्यवान साधक बनना होगा|’ तभी तो किसी ने खूब कहा – रख हौसला वो मंज़र भी आएगा, प्यासे के पास चलकर समंदर भी आएगा| थक कर न बैठ ए मंज़िल के मुसाफिर, मंज़िल भी मिलेगी और मिलने का मज़ा भी आएगा|| एक शिष्य के भीतर इन सभी गुणों का जन्म, ध्यान की गहराई में उतरने पर स्वतः ही होने लगता है| अतः शिष्य को चाहिए कि वह साधना की प्रक्रिया के द्वारा इन गुणों को अपने आचरण में उतारे तभी वह सच्चा शिष्य बन कर अपना व समाज का कल्याण कर पाएँगा|

कार्यक्रम में संस्थान के स्वयंसेवकों द्वारा एक नाटिका भी प्रस्तुत की गई| जिसमें नारी, तू है शक्ति प्रस्तुति को दर्शाया गया एवं समाज को जागरूक किया गया कि आदिकाल से नारी सर्वसमर्थ रही, पहले युग में नारी ने ऐसे ऐसे योग्य काम किए जो समाज निर्माण में काबिल सिद्ध हुए इसलिए समय है कि आज भी नारी को उतना ही सम्मान दिया जाए, उसे भी आगे बढ़ने की सुअवसर प्रदान किए जाए जिसके द्वारा राष्ट्र निर्माण हेतु कार्यों को सफ़ल बनाया जा सके|