लालच और घमंड से कुछ हासिल नहीं होता है

एक अमीर के पास खास किस्म का अमृत था, जिसे पीकर किसी भी बीमारी को ठीक किया जा सकता था। लेकिन यह बात उसने किसी को नहीं बताई थी। एक दिन देश के राजा बीमार पड़ गए। अमीर ने सोचा यह राजा हैं, इनके लिए तो देश-विदेश से जड़ी-बूटियां मंगवाई जा सकतीं हैं। अगर मैने अपना अमृत इन्हें दिया, तो उसका कोई मोल नहीं होगा। इन्हें मैं अपना अमृत देकर क्यों व्यर्थ करूं। अगर  राजा को अमृत दे दूं, तो मुझे कुछ स्वर्ण मोहरें मिलेंगी, ज्यादा से ज्यादा थोड़ी इज्जत मिलेगी, सो तो मेरे पास अब भी है।

कुछ दिन में राजा औषधियों से ठीक हो गए। फिर कुछ दिन बाद देश के बड़े संत बीमार पड़े। अमीर ने सोचा, यह तो संत हैं। इनके तो देश-विदेश में कितने अनुयायी हैं। यह मेरे अमृत का महत्व क्या समझेंगे। अगर वह ठीक हो भी गए, तो उसे ईश्वर की इच्छा करार देंगे। मेरा इसमें क्या भला? कुछ दिन बाद वह संत भी ठीक हो गए। फिर एक दिन अमीर को एक बहुत ही गरीब बूढ़ा मिला, जो मरने की कगार पर था। अमीर ने सोचा, अगर मैने इसे अमृत दे भी दिया, तो भी यह ज्यादा जी नहीं पाएगा, क्योंकि इसके पास तो खाने-पीने के भी लाले हैं। मै क्यों अमृत बर्बाद करूं? साल बीतते गए और अमृत पुराना होता गया। अमीर ने न अमृत खुद पिया, न किसी को पिलाया। फिर एक दिन अमीर बीमार पड़ गया।

उसने सोचा, यही समय है अमृत के सही उपयोग का। जब वह संदूक से अमृत निकालने पहुंचा, तो देखा कुछ मोटे चूहे संदूक के आसपास घूम रहे हैं। अमीर ने जैसे ही संदूक खोला, उसने देखा अमृत की बोतल टूटी हुई है और संदूक के छेद से अंदर घुस कर कुछ चूहे कई वर्षों से अमृत का सेवन कर रहे हैं। अमीर यह देखकर सदमे से चिल्लाने लगा।