विजयदशमी – धर्म की अधर्म पर विजय

(श्री राम की विश्वास नैया पर अनंत सागर को पार कर, उत्साह रूपी शस्त्र ले, छोटी सी वानर सेना विशाल-सेना के सामने खड़ी हो गई थी)

(‘विजयदशमी’ प्रतीक रूप में अंत है – रावणत्व का, असुरीय अवगुणों का)

(नारद मुनि ने भी ‘काम’ रूपी सागर को ‘वैराग्य’ रूपी नौका से पराजित किया) – श्री आशुतोष महाराज जी

विजयदशमी का एक तात्त्विक अर्थ है- ‘वैराग्य’ की ‘काम’ पर विजय! ‘वैराग्य’ ही ‘काम’ को समाप्त करने का माध्यम है। परन्तु यह भी अटल नियम है कि वैराग्य को अहंकार विहीन होना चहिए। गुरु- आज्ञा के आधार को लिए होना चाहिए। इसीलिए श्री रामकृष्ण परमहंस जी अधिकतर अपने शिष्यों को वैराग्य के विषय में समझाते हुए कहा करते थे – ‘वैराग्य’ का अर्थ सिर्फ संसार से विराग नहीं है। ईश्वर पर अनुराग और संसार से विराग – दोनों है।’ घूमते कालचक्र के साथ असंख्य युद्ध-संग्राम घटे।

कहीं राज्य की अभिलाषा थी, तो कहीं कोई और कामना परन्तु इतिहास मात्र उन संग्रामों को पाकर सौभाग्य का अनुभव कर पाया, जिनका उद्देश्य धर्म – संस्थापना था। ऐसा ही एक अद्वितीय संग्राम हुआ था, त्रेतायुग में। प्रभु श्री राम व असुरराज रावण के बीच। यह युद्ध वास्तव में अद्भूत था। इसमें एक ओर थे- प्रशिक्षित, हृदयविहीन योद्धा, अस्त्र-शस्त्र से लैस, छल-बल को लिए हुए। उनके साथ थी अपार सेना। वहीं दूसरी ओर थीं, वन प्रजातियाँ जिन्हें युद्ध का कुछ खास अभ्यास-अनुभव नहीं था।

अस्त्र व शस्त्र भी उनके पास अधिक नहीं थे। मात्र श्री राम की विश्वास नैया पर अनंत सागर को पार कर, उत्साह रूपी शस्त्र ले, वह छोटी सी सेना विशाल-सेना के सामने खड़ी हो गई थी। फिर हुआ था एक ऐसा संग्राम, जिसने मानव बुद्धि के तर्कों को निरस्त्र कर दिया। क्योंकि प्रभु राम की अगुआई में जीत गई थी वानर-सेना। हार गए थे धुरंदर असुर! इस विजयश्री को आज युगों बाद भी हम ‘विजयदशमी’ के रूप में मनाते हैं। यह प्रतीक रूप में अंत है – रावणत्व का, असुरीय अवगुणों का। विजय है, अधर्म पर धर्म की। इसलिए आज भी विजयदशमी पर रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के पुतले जलाए जाते हैं। कुम्भकरण रावण का भाई था और मेघनाथ रावण का पुत्र। दोनों ने ही युद्ध में अहं भूमिका निभाई। पर मेघनाथ रावण का गर्व था।

उसका बाहुबल था। कहते हैं कि जन्म के समय उसने मेघों के समान ऐसा घनघोर रुदन किया था कि उसका नाम रखा गया – मेघनाथ! मेघनाथ ने रावण के सभी अवगुण उससे विरासत में पाए थे। उसमें से मुख्य था – काम। गोस्वामी तुलसीदास जी ने तो मेघनाथ के विषय में विनय पत्रिका में कहा – जब रावण के बड़े-बड़े योद्धा, सेनानायक मृत्यु द्वारा ग्रस लिए गए, जब रावण की ओर से युद्ध करने के लिए रणभूमि में उतरा- मेघनाथ। उसने युद्धभूमि में आते ही ऐसे बाणों का संधान किया कि सारी वानर सेना व्याकुल हो गई। तब श्री लक्ष्मण मेघनाथ से युद्ध करने के लिए उसके समक्ष आए।

जहाँ गोस्वामी जी ने मेघनाथ को ‘काम’ कहा, वहीं वह लक्ष्मण जी के लिए कहते हैं – लक्ष्मण जी ‘वैराग्य’ स्वरूप हैं। सत्य ही है, ‘काम’ रूपी खड़ग के प्रहार की काट मात्रा ‘वैराग्य’ रूपी ढाल के पास ही हो सकती है। मेघनाथ व लक्ष्मण जी के बीच युद्ध आरंभ हुआ। परन्तु विजय किसकी होगी, यह कुछ कहा नहीं जा सकता था। काफी देर युद्ध चलता रहा। मेघनाथ ने छल-बल का प्रयोग किया और फिर एकाएक वीरघातिनी शक्ति द्वारा लक्ष्मण जी को मूर्छित कर दिया। अनुज लखन को मूर्छित देख श्री राम अत्यन्त विलाप करने लगे! श्री राम व्यथित हृदय से कहने लगे – ‘हे लखन’! हे अनुज! जिस प्रकार तुम मेरे साथ वन में आए थे, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे साथ परलोक में जाऊँगा। पर विचारणीय तथ्य यह है कि श्रीराम सर्वशक्तिमान हैं। अब तक उनकी कृपा से युद्ध में कोई प्रमुख योद्धा क्षत-विक्षत नहीं हुआ। वे चाहते तो अपने अनुज लखन को भी इस मूर्छा से बचा सकते थे। फिर उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया? उन्होंने क्योंकर ‘वैराग्य’ को ‘काम’ द्वारा मूर्छित होने दिया? इन सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है। वह यह कि प्रभु अपने आदर्शों के विपरीत नहीं जाते।

लखन जी जब युद्ध के लिए गए, तो उनसे एक भूल हो गई – लक्ष्मण जी प्रभु राम से आज्ञा मांग कर, क्रोधपूर्वक चले। विचार करें, लखन जी ने आज्ञा तो मांगी थी, परन्तु प्रभु ने आज्ञा प्रदान नहीं की थी। और क्रोधित होकर चलने से अभिप्राय? क्रोध वही व्यक्ति करता है, जो अहंकारी होता है। अतः लखन जी से दो भूलें हुईं – एक तो श्री राम जी से आज्ञा को प्राप्त नहीं किया और दूसरा अहंकार से पूर्ण होकर चले। और यह तो अटल सत्य है कि जब साधक बिना गुरु-आज्ञा के और अहंकार से पूर्ण हो अपने ‘वैराग्य’ द्वारा ‘काम’ को पराजित करने का प्रयास करता है, तो ‘काम’ द्वारा खुद ही मूर्छित हो जाता है। विश्वामित्र जी ने ‘काम’ पर विजय पाने का प्रयास किया। परन्तु उनका ‘वैराग्य’ अहंकार से पूर्ण व ईश्वरीय कृपा से विहीन था। परिणामस्वरूप अनंत प्रयास करने के बाद भी उनका वैराग्य मूर्छित हो गया।

नारद मुनि ने भी ‘काम’ रूपी सागर को ‘वैराग्य’ रूपी नौका से पराजित किया। परन्तु ज्यों ही अहम् का भार उसमें समाया कि वह ‘वैराग्य नौका’ उसी ‘काम रूपी’ सागर में डूब गई। हम देखें, सबसे पहले मेघनाथ भी रथ पर बैठकर लड़ने के लिए आया, तब प्रतीक रूप में वह इन्द्रियों के स्तर पर था। दूसरे युद्ध में मेघनाथ ने छल-बल से युद्ध किया याने वह प्रत्यक्षतः दृष्टिगोचर नहीं हुआ, तब कह सकते हैं कि ‘काम’ मन में है। अब यदि अंत में यज्ञ सम्पन्न हो गया, तो वह ‘काम’ बुद्धि में प्रविष्ट हो जाएगा। तब उसका वध सम्भव नहीं। इसीलिए विभीषण जी चिंतित थे।तब प्रभु श्रीराम ने लखन जी को मेघनाथ वध की आज्ञा दी – उसे ऐसे बल व बुद्धि के उपास से मारना, जिससे निशाचर का नाश हो। जब रघुबीर दीन्हि अनुसासन- जब श्री रघुवर जी ने आज्ञा दी, तब लखन जी उस निशाचर के वध के लिए चले।

पहलेपहल मेघनाथ द्वारा रचित यज्ञ का विध्वंस किया। फिर प्रभु राम का स्मरण कर बाण छोड़ा, जो सीधा मेघनाथ के हृदय के बीच लगा तथा वह मृत्यु को प्राप्त हुआ। लक्ष्मण जी की मेघनाथ पर विजय तात्त्विक दृष्टि से ‘वैराग्य’ की ‘काम’ पर विजय है। ‘वैराग्य’ ही ‘काम’ को समाप्त करने का माध्यम है। परन्तु यह भी अटल नियम है कि वैराग्य को अहंकार विहीन होना चाहिए। गुरु-आज्ञा के आधार को लिए होना चाहिए। इसीलिए श्री रामकृष्ण परमहंस जी अधिकतर अपने शिष्यों को वैराग्य के विषय में समझाते हुए कहा करते थे – ‘वैराग्य का अर्थ सिर्फ संसार से विराग नहीं है। ईश्वर पर अनुराग और संसार से विराग – दोनों है।’ इसलिए आइए, हम सब साध्क भी इस बार विजयदशमी को सार्थक करने के लिए ‘काम’ रूपी मेघनाथ के सामने ‘वैराग्य’ रूपी श्री लखन को अहंहीन व गुरु-आज्ञा अनुरूप कर खड़ा करें। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान, अखंड ज्ञान मासिक पत्रिका से उद्ग्रित!