शादियों में क्यों पहनाई जाती है ‘वरमाला’

1. भारतीय शादियां
भारत जैसे सांस्कृतिक देश में शादी एक ऐसा कार्यक्रम है, जिसे एक उत्सव के रूप में देखा जाता है। चाहे वे वर पक्ष के हों या वधु के परिवार वाले हों, दोनों की ओर से शादी के कार्यक्रम में किसी भी प्रकार की कमी नहीं रखी जाती। क्योंकि उनकी समझ में यह एक ऐसा आयोजन है, जो खास महत्व रखता है।

2.शादी के रीति-रिवाज़
इस कार्यक्रम से जुड़े सभी रीति-रिवाज़ सही समय पर और सम्पूर्ण तरीके से हों यह भी दोनों परिवारों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। अब इस देश में जितने धर्म एवं जातियां हैं, उससे कई गुणा ज्यादा तो उनमें पाए जाने वाले शादी से सम्बन्धित रीति-रिवाज़ हैं।

3.वरमाला की रस्म
शादी के दिन दूल्हे की बारात से लेकर उसके द्वारा वधु को सिंदूर लगाने, मंगलसूत्र पहनाने तथा सात फेरे लेने जैसी रस्मों के बीच में भी कई रस्में आती हैं। जिसमें से एक खास रस्म है ‘जयमाला’ पहनाने की। इसे वरमाला भी कहा जाता है।

4.क्या है कारण?
विवाह में वरमाला की रस्म अदा करने के कई कारण है। जिसमें से एक कारण प्राचीन इतिहास से जुड़ा है। ऐसा माना जाता है कि वरमाला की रस्म कुछ वर्षों पुरानी नहीं, बल्कि सदियों पुरानी है। इतनी पुरानी कि इस रस्म ने हिन्दू शास्त्रों एवं ग्रंथों में भी अपनी जगह बनाई है।

5.एक प्राचीन रस्म
प्राचीन समय में इस रस्म को ही सब कुछ मानने वाला एक विवाह मौजूद था, जिसे शास्त्रों में गन्धर्व विवाह कहा जाता था। यह एक ऐसा विवाह था जिसमें यदि वर-वधु एक-दूसरे को पसंद करते हैं और उन्हें शादी करने के लिए किसी अन्य रिश्तेदार या बड़े-बुजुर्ग की आवश्यकता नहीं, तो वे गन्धर्व विवाह करते थे।

6.गन्धर्व विवाह
इस विवाह में दूल्हा-दुल्हन एक-दूसरे को पेड़ के नीचे खड़े होकर फूलों की एक माला पहनाते थे। इस विवाह में दोनों पक्षों की आपसी सहमति बेहद मायने रखती थी, लेकिन दोनों की ओर से किसी अपने के होने की जरूरत नहीं पड़ती थी। यदि इस खास प्रकार के विवाह को हम आज के युग से मिलाएं, तो हम इसे ‘लव मैरेज’ का नाम भी दे सकते हैं।

7.लेकिन एक अंतर
लेकिन गन्धर्व विवाह तथा लव मैरेज में अंतर केवल इतना है कि प्रेम विवाह में दोनों पक्षों में से किसी दोस्त या अपने की आवश्यकता जरूर होती है, जो दोनों की ओर से उस विवाह के गवाह का काम कर सके।

8.श्रीराम-सीता का विवाह
गन्धर्व विवाह के अलावा प्राचीन काल में और भी कई ऐसे विवाह देखे गए हैं जिनमें वरमाला का सबसे बड़ा रोल रहा है। उदाहरण के लिए श्रीराम तथा सीताजी के विवाह को कोई कैसे भूल सकता है।

9.राजा जनक की पुत्री का स्वयंवर
राजा जनक द्वारा अपनी पुत्री के विवाह के लिए स्वयंवर रचाया गया था जिसमें शर्त थी कि जो भी उनके द्वारा प्रदान किए गए धनुष को तोड़ पाएगा, वही सीता के लिए योग्य वर होगा। स्वयंवर में उपस्थित सभी धुरंधरों के प्रयास करने के बाद अंत में भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम द्वारा ही धनुष तोड़ा गया था।

10.स्वयंवर में पहनाई वरमाला
स्वयंवर की शर्त पूर्ण करने के बाद सीताजी द्वारा श्रीराम के गले में फूलों की माला डाली गई थी, जिसके बाद दोनों को विवाहित घोषित किया गया। सीताजी की तरह ही द्रौपदी ने भी स्वयंवर में राजकुमार अर्जुन को वरमाला पहनाकर अपने पति के रूप में चुना था।

11.फूलों का महत्व
इन कहानियों को जानने के बाद आप समझ सकते हैं कि कैसे महज कुछ फूलों की माला रिश्तों को जोड़ने में सफल होती है। लेकिन वरमाला पहनाने का रिवाज़ केवल फूलों की वजह से ही नहीं बना है। बल्कि यह रिवाज़ तो प्राचील काल में स्त्रियों के अधिकार को दर्शाता है।

12.दोनों को जयमाला दी जाती है
आजकल शादियों में इस रस्म को अदा करने के लिए दूल्हा एवं दुल्हन दोनों को जयमाला दी जाती है। यह माला आमतौर पर वधु पक्ष की ओर से ही तैयार की जाती है। गुलाब के या फिर अन्य सुगंधित फूलों से बनी यह माला पहले वधु द्वारा वर को पहनाई जाती है और बाद में वर भी वधु को माला पहनाता है।

13.एक अलग स्टेज
इसके लिए अलग से एक स्टेज तैयार किया जाता है। कई बार यह स्टेज घुमावदार होता है। कई शादियों में तो ऐसा स्टेज भी लगाया जाता है जो वर-वधु दोनों को काफी ऊंचाई पर ले जाता है, और वहां पर दोनों जब एक-दूसरे को माला पहनाते हैं तो पंडाल में मौजूद एक-एक व्यक्ति उन्हें ऊंचाई पर देख सकता है। खैर तरीका चाहे कैसा भी हो, लेकिन भारतीय मानसिकता कुछ ऐसी है जो शादी जैसे कार्यक्रम में कोई भी रस्म अधूरी छोड़ना सही नहीं समझती।