शिकायत यूं करें कि सुनी जाए,साफतौर पर अपनी बात रखें लेकिन सवालों का तांता न लगाएं

पत्नियों की अक्सर शिकायत होती है कि पति उन्हें पर्याप्त वक्त नहीं देते। वहीं पति ये कहते मिल जाते हैं कि पत्नियां अधिक खर्च करती हैं। ये शिकायतें मामूली हैं पर कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें कहना और समझना दोनों जरूरी हैं, ताकि रिश्ता हरा रहे। ऐसी कई शिकायतें या बातें हैं जो मन के भीतर किसी कोने में सालों-साल चलती रहती हैं पर कभी कहने का अवसर नहीं मिलता, तो कभी लगता। रिश्तों में शिकायतें होना आम हैं। खासतौर पर यदि रिश्ता जीवनभर का है तो यह सब और भी सामान्य है। पर शिकायत की नियति तो उसके दूर किए जाने में है। पहले यह प्रयास हो कि शिकायत सुनी जाए, जानिए तरीके।

भावनाएं व्यक्त करें

जो चाहते हैं उसे कहें भी 

यदि आपको लगता है कि सामने वाला आपकी भावनाओं को समझता नहीं हैं तो मन में कयास लगाने से बेहतर है इस बारे में बात करें। यदि आप चाहती हैं कि पति आपको समय दें तो उन्हें इससे अवगत कराएं। पति चाहते हैं कि आप रोक-टोक कम करें या सवाल कम पूछें तो इस आदत में भी बदलाव लाना होगा। जो भी मन में हैं उसे जब तक एक-दूसरे से साझा नहीं करेंगे तब तक समस्या का समाधान कैसे निकलेगा।

क्या न करें मन में गलतफहमी पालकर न बैठें। इस बात का इंतज़ार न करें कि सामने वाला ही बातचीत शुरू करेगा/करेगी। शिक़ायतों का पिटारा जितनी जल्दी खोलेंगे समस्या उतनी जल्दी सुलझेगी

समस्या जानने की कोशिश करें

अब बातचीत शुरू हो ही गई है तो इस बात को जानना ज़रूरी है कि समस्या कहां है। साथी से पूछें कि उनके व्यवहार के पीछे का कारण क्या है या आपकी कोई आदत या अनजाने में की गई गलती के कारण ऐसा है। इस तरह पूछने से वे सहजता से अपने मन की बात आपके सामने रख सकेंगे। हो सकता है कि उनके व्यवहार का कारण कोई अन्य समस्या हो जिसे लेकर वो शांत रहते हों या चर्चा करना मुनासिब न समझते हों।

क्या न करें समस्या जानना चाहते/चाहती हैं तो सवालों का तांता न लगाएं। सवाल पूछने के बाद जवाब देने का समय दें। लगातार सवाल पूछने से चिढ़चिढ़ाहट होना सामान्य है।

  1. कुछ बुरा लगा हो और कह पाने में झिझक महसूस हो रही हो, तो इस असमंजस से बाहर निकलिए। अभिव्यक्ति जरूरी है। मन में रखेंगे, तो कभी गुस्से में वह सारा जमा हुआ असंतोष निकल आएगा। कह देना, रिश्ते की मज़बूती के लिए जरूरी है। ऐसे वक्त की तलाश करें जब आप और आपका साथी दोनों के पास बातचीत के लिए पर्याप्त समय हो। ध्यान रखें कि समय ऐसा चुनें जब दोनों ही शांत मूड में हों। ऐसा न हो कि बातचीत शुरू हो और शिकायतों का पिटारा खुल जाए। जो भी एक-दूसरे से कहना है उसके लिए साधारण बातचीत से शुरू करें।
  2. क्या न करें- शुरूआत होते ही ताने देना या आलोचना न करें। इससे सामने वाला खीझ कर या तो चला जाएगा या बातचीत बहस में बदल जाएगी। सामने वाले को ये न लगे कि आप उसे दोष दे रहे हैं, बल्कि ये लगे कि आप मन की बात रख रहे हैं।
  3. जो कहना है उसे साफ कहें-जब आप बातचीत की शुरुआत करते हैं और अपने साथी को बताते हैं कि आप उनके व्यवहार को लेकर कैसा महसूस करते हैं, तो इस दौरान सटीक बात करें और उस एक बात के बारे में बताएं जो आपको तकलीफ देती है ताकि सामने वाला पहले समझे और फिर अपने व्यवहार में बदलाव ला सके।
  4. क्या न करें हवा में बातें करने से कोई सार नहीं निकलेगा। जो भी शिकायत है उसे कहने का तरीका ऐसा हो कि दोषारोपण न लगे।