शीर्षक ऐसा हो जिसकी जिज्ञासा अंत तक ना खुले

उज्जैन। लघुकथा रचते समय उसके शीषर्क का बहुत महत्व होता है। शीर्षक एक संकेत है, इसमें जिज्ञासा होनी चाहिए, और अंत तक जिज्ञासा खुलनी नहीं चाहिए। शीर्षक रचना की खंूटी होता है।
यह बात श्रीकृष्ण सरल जन्मशती वर्ष के अंतर्गत सरल काव्यांजलि द्वारा आयोजित लघुकथा गोष्ठी एवं कार्यशाला में शीर्षक को लेकर लघुकथाकार की जद्दोजहद विषय पर नईदिल्ली से आए ख्यात लघुकथाकार डॉ. बलराम अग्रवाल ने कही। इस मौके पर नगर के लघु कथाकारों संतोष सुपेकर एवं राजेन्द्र नागर निरंतर के कोलकाता से बांग्ला भाषा में अनुदित लघुकथा संकलन शिप्रा थैके गंगा पर्यन्तोÓ (शिप्रा से गंगा तक) का विमोचन किया गया। श्रीराम दवे ने अपनी प्रसिद्ध रचना ओटला का पाठ किया। अध्यक्षता प्रतापसिंह सोढ़ी (इंदौर) ने की। प्रारंभ में सरस्वती वंदना राजेन्द्र नागर ने गाई। अतिथि स्वागत डॉ. संजय नागर व एमजी सुपेकर ने किया। संचालन राजेन्द्र देवधरे दर्पण ने किया। आभार डॉ. पुष्पा चौरसिया ने माना।