सबसे पहले महाकाल को बंधती है राखी

उज्जैन। धार्मिक नगरी उज्जैन में रक्षाबंधन की अपनी अनूठी परंपरा है। उज्जैन में रक्षाबंधन की शुरुआत महाकाल मंदिर से होती है। सबसे पहले बाबा महाकाल को राखी अर्पित की जाती है। वहीं महाकाल मंदिर परिक्षेत्र स्थित बड़े गणेश को भी देश-विदेश से राखी भेजने वाली महिलाओं की कमी नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि बड़े गणेश को अपना भाई मानने वाली कई महिलाएं हर वर्ष राखी और मिठाई उज्जैन भेजती हैं। रक्षाबंधन त्यौहार की परंपरा का उल्लेख हमारे पौराणिक ग्रंथों में भी मिलता है।
रक्षाबंधन और श्रावण पूर्णिमा ये दो अलग-अलग पर्व हैं जो उपासना और संकल्प का अद्भुत समन्वय है और एक ही दिन मनाए जाते हैं। पुरातन व महाभारत युग के धर्म ग्रंथों में इन पर्वों का उल्लेख पाया जाता है। यह भी कहा जाता है कि देवासुर संग्राम के युग में देवताओं की विजय से रक्षाबंधन का त्योहार शुरू हुआ। इसी संबंध में एक और किवदंती प्रसिद्ध है कि देवताओं व असुरों के युद्ध में देवताओं की विजय को लेकर कुछ संदेह होने लगा।

तब देवराज इंद्र ने इस युद्ध में प्रमुखता से भाग लिया था। देवराज इंद्र की पत्नी इंद्राणी श्रावण पूर्णिमा के दिन गुरु बृहस्पति के पास गई थी तब उन्होंने विजय के लिए रक्षाबंधन बांधने का सुझाव दिया था। जब देवराज इंद्र राक्षसों से युद्ध करने चले तब उनकी पत्नी इंद्राणी ने इंद्र के हाथ में रक्षासूत्र बांधा था जिससे इंद्र विजयी हुए थे। पुराणों में श्रावणी पूर्णिमा को पुरोहितों द्वारा किया जाने वाला आशीर्वाद कर्म भी माना जाता है। मध्ययुगीन भारत में हमलावरों की वजह से महिलाओं की रक्षा के लिए भी रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता था। यह एक धर्म-बंधन था। तभी से महिलाएं सगे भाइयों या मुंहबोले भाइयों को रक्षासूत्र बांधने लगीं। महाराष्ट्र के कई भागों में श्रावणी पूर्णिमा के दिन जलदेवता वरुण की आराधना की जाती है। इस दिन बहन तिलक-अक्षत लगाकर भाई की कलाई पर राखी बांधती है। भाई भी श्रद्धा से अपने सामथ्र्य के अनुसार उपहार देता है। जहां तक श्रावणी के दिन रक्षाबंधन पर्व का सवाल है, यह श्रावणी को होने वाला एक पर्व है। रक्षाबंधन को सलोनो नाम से भी जाना जाता है। यह भी कहा जाता है श्रावणी के दिन पवित्र सरोवर या नदी में स्नान करने के बाद सूर्य को अघ्र्य देना इस विधान का जरूरी अंग है।

जैन धर्म और रक्षाबंधन
पं. संतोष जैन ने अक्षरविश्व से चर्चा में बताया कि जैन धर्म में रक्षाबंधन के पीछे करीब दो हजार वर्ष पुरानी कथा का प्रसंग जुड़ा हुआ है। इस दिन जैन समाजजनों द्वारा जैन मंदिरों के बाहर राखी बांधी जाती है। इसके अलावा एक-दूसरे को राखी बांधने की प्राचीन परंपरा भी विद्यमान है। धर्म की रक्षा का संकल्प लेने के साथ ही प्राचीन कथा प्रसंग को मंदिरों में मौजूद संतों द्वारा सुनाने का कार्य किया जाता है।

जैन धर्म के अनुसार रक्षाबंधन क्यों?
भगवान मुनिसुव्रत के समय की कहानी है। उज्जैन नगरी में राजा श्रीवर्मा राज्य करते थे। उनके बलि, नामुचि, बृहस्पति और प्रहलाद आदि चार मंत्री थे। उन्हें धर्म पर श्रद्धा नहीं थी। एक बार उस नगरी में 700 मुनियों के संघ सहित आचार्य अकम्पनजी का आगमन हुआ। राजा भी उनके मंत्री के साथ गए। राजा ने मुनि को वंदन किया, पर मुनि तो ध्यान में लीन व मौन थे। राजा उनकी शांति को देखकर बहुत प्रभावित हुआ, पर मंत्री कहने लगे महाराज! इन जैन मुनियों को कोई ज्ञान नहीं है इसीलिए मौन रहने का ढोंग कर रहे हैं। इस प्रकार निंदा करते हुए वापस जा रहे थे और यह बात श्रुतसागर नामक मुनिश्री ने सुन ली उन्हें मुनि संघ की निंदा सहन नहीं हुई। इसलिए उन्होंने उन मंत्री के साथ वाद-विवाद किया। मुनिराज ने उन्हें चुप कर दिया।

राजा के सामने अपमान जानकार वह मंत्री रात में मुनि को मारने गए पर जैसे ही उन्होंने तलवार उठाई उनका हाथ खड़ा ही रह गया। सुबह सब लोगों ने देखा और राजा ने उन्हें राज्य से बाहर कर दिया । ये चार मंत्री हस्तिनापुर में गए। यहां पद्मराय राजा राज्य करते थे। उनके भाई मुनि थे – उनका नाम विष्णुकुमारथा। सिंहरथ नाम का राजा इस हस्तिनापुर के राजा का शत्रु था। पद्मराय राजा उसे जीत नहीं सकता था। अंत में बलि मंत्री की युक्ति से उसे जीत लिया था इसलिए राजा ने मुंह मांगा इनाम मांगने को कहा पर मंत्री ने कहा जब आवश्यकता पड़ेगी तब मांग लूंगा। इधर आचार्य श्रीअकम्पन जी आदि 700 मुनि भी विहार करते हुए हस्तिनापुर पहुंचे। उनको देखकर मंत्री ने उन्हें मारने की योजना बनाई। उन्होंने राजा के पास वचन मांग लिया। उन्होंने कहा महाराज हमें यज्ञ करना है इसलिए आप हमें सात दिन के लिए राज्य सौंप दें। राजा ने राज्य सौंप दिया फिर मंत्रियों ने मुनिराज के चारों और पशु, हड्डी, मांस, चमड़ी के ढेर लगा दिए फिर आग लगा दी। मुनिवरो पर घोर उपसर्ग हुआ। यह बात विष्णुकुमार मुनि को पता चली। वह हस्तिनापुर गए और एक पंडित का रूप धारण कर लिया और बलि राजा के सामने उत्तमोत्तम श्लोक बोलने लगे।

बलि राजा पंडित से बहुत खुश हुआ और इच्छित वर मांगने को कहा। विष्णुकुमार ने तीन पग जमीन मांगी। विष्णुकुमार ने विराट रूप धारण किया और एक पग सुमेरु पर्वत पर रखा और दूसरा मानुषोतर पर्वत पर रखा और बलि राजा से कहा बोल अब तीसरा पग कहा रखू? तीसरा पग रखने की जगह दे नहीं तो तेरे सिर पर रखकर तुझे पाताल में उतार दूंगा। चारों और खलबली मच गई। देवो और मनुष्यों ने विष्णुकुमार मुनि को विक्रिया समेटने के लिए कहा चारों मंत्रियों ने भी क्षमा मांगी।

श्री विष्णुकुमार मुनि ने अहिंसा पूर्वक धर्म का स्वरूप समझाया। इस प्रकार विष्णुकुमार ने 700 मुनियों की रक्षा की। हजारों श्रावक ने 700 मुनियों की वैयावृति की और बलि आदि मंत्री ने मुनिराजो से क्षमा मांगी। जिस दिन यह घटना घटी उस दिन श्रावण सुदी पूर्णिमा थी। विष्णुकुमार ने 700 मुनियों का उपसर्ग दूर हुआ और उनकी रक्षा हुई। अत: वह दिन रक्षा पर्व के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आज भी यह दिन रक्षाबंधन पर्व के नाम से मनाया जाता है। विष्णु मुनिराज ने उपसर्ग दूर किया धर्म की रक्षा की किंतु इसके कारण उसने मुनीपना छूट गया और फिर से आचार्य के पास मुनि दीक्षा अंगीकार किया। वास्तव में कर्मों से न बंधकर स्वरूप की रक्षा करना ही रक्षाबंधन है।