समस्याएं ही आपको योग्यताओं को बाहर लाती हैं

किसी बीमारी के इलाज की खोज में दशकों तक विविधप्राणियों पर क्लिनिकल ट्रायल किए जाते हैं। हर असफल क्लिनिकल ट्रायल में जीवों की जान जाती है। जीव अकसर लिवर पर हुए किसी विशेष दवा के असर से मरते हैं।

युवा वैज्ञानिक अरुण चंद्रू और उनके साथियों ने मिल कर ऐसी कृत्रिम कोशिकाएं बनाने में कामयाबी हासिल की है, जो हमारे लिवर की तरह काम करती हैं। इससे हम दवाइयों की खोज में जीवों पर की जाने वाली क्रूरता को खत्म करने में समर्थ होंगे और प्रयोगों के लिएउन पर निर्भरता भी कम होगी।

अरुण चंद्रू बैंगलुरु के स्टार्टअप पेंडोरम टेक्नोलॉजी के संस्थापक सदस्य हैं। यह स्टार्टअप टिशू इंजीनियरिंग और रीजेनेरेटिव मेडिसिन पर काम कर रहा है। वह अपनी इस उपलब्धि के लिए फोर्ब्स की 30 अंडर 30 एशिया 2016 की सूची में भी आ चुके हैं।

कैसे हुए प्रेरित 
अरुण चंद्रू ने बैंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से पढ़ाई की है। वह एअरोस्पेस इंजीनियरिंग में पीएचडी हैं। वह उन चुनिंदा युवाओं में से हैं, जो लैब रिसर्च को समाज के लिए कुछ उपयोगी बनाने में लगाना चाहते थे। वह पढ़ते रहते थे कि बीमारियों और दवाइयों के परीक्षण के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिक और स्टार्टअप मानव कोशिकाओं से कृत्रिम अंग बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। उन्होंने इसी संस्थान में पढ़ने वाले अपने मित्र तुहिन भौमिक को कृत्रिम अंग बनाने की अपनी योजना के बारे में बताया

दोनों ने मिल कर भारत सरकार के बायोटेक विभाग के एंटरप्रिन्योरशिप प्रतियोगिता में भाग लिया। वह जख्म को भरने के लिए बायोपॉलीमर के विकास की योजना के साथ प्रतियोगिता में शामिल हुए थे। उनकी इस योजना को पहला पुरस्कार मिला। वहां मौजूद अनुभवी शिक्षकों ने उन्हें अपने इस विचार को किसी विशेष फायदे तक सीमित करने के बजाय एक तकनीकी प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित करने की सलाह दी। इससे उत्साहित अरुण और उनके साथी कृत्रिम अंग बनाने की तकनीक की योजना पर अमल में लग गए।

शुरुआत में वह दोस्तों और रिश्तेदारों से मिले सहयोग से अपनी शोध-गतिविधियों को जारी रखे हुए थे। आखिर साल 2011 में स्टार्टअप पेंडोरम टेक्नोलॉजी की शुरुआत की। जब काम नहीं चल रहा था, तो उन्होंने अपनी योजना के बारे में बायोटेक विभाग को बताया। इससे उन्हें अपने प्रयोगों के लिए जरूरी सुविधाएं मिल पाईं। साथ में भारत सरकार ने उनकी योजना को आगे बढ़ाने में मदद की। साल 2015 में उन्हें कृत्रिम मानव लिवर कोशिका बनाने में सफलता मिली। उसी साल ‘मेडिकल स्टार्टअप्स’ ने उन्हें कृत्रिम अंग बनाने वाले शीर्ष 10 स्टार्टअप में जगह दी। अब वह आंखों के कॉर्निया की प्रत्यर्पण तकनीक पर काम कर रहे हैं, जो दुनिया में अपनी तरह का पहला प्रयोग है। वह शोध से आगे उत्पादन पर ध्यान दे रहे हैं।

– काम की बात 
कोई भी समस्या तब तक बड़ी लगती है, जब तक उसे हल करने के लिए हमारे पास कोई प्रभावी योजना नहीं होती। समाधान मिलते हैं, सही शिक्षा और मार्गदर्शकों की मदद से।