समाज को त्याग, तप, परोपकार जैसे आदर्शों की आवश्यकता

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा दिल्ली स्थित दिव्य धाम आश्रम में मासिक सत्संग समागम का आयोजन किया गया! जिसमें हज़ारों की संख्या में श्रद्धालुगण अध्यात्मिक विचारों को श्रवण करने के लिए कार्यक्रम स्थल पर पहुँचे! कार्यक्रम की शुरुआत प्रभु की पावन आरती से की गई! गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी के समर्पित शिष्य एवं शिष्याओं ने सुमधुर भजनों की श्रृंखला एवं शास्त्र ग्रंथों में दिए गए दिव्य संदेशों एवं प्रेरणाओं को संगत के समक्ष रखा! साध्वी जी ने कहा कि जिस प्रकार मिठाई से मिठास, दूध से घी निकाल लेने से ये निःसार, तेजहीन हो जाते हैं। वैसे ही मानव के जीवन में संस्कार न हो तो वह तेजहीन हो जाता है। इन संस्कारों के अभाव में आज का वर्ग पश्चिमी सभ्यता का आंखें बंद कर अनुकरण कर रहा है। परन्तु समाज द्वारा इन आदर्शों को चुने जाने से व्यक्तिगत कितनी भी उपलब्धियां हासिल कर ली जाए, परन्तु तप, त्याग, परोपकार जैसे आदर्श स्थापित नहीं किए जा सकते! पश्चिमी सभ्यता की नकल करने से हमारे परिधान, चाल-ढाल में अवश्य परिवर्तन आ सकता है किंतु विश्व रूपी बगिया को सरस, सुंदर संस्कारों से परिपूर्ण नहीं बनाया जा सकता! हमारे इतिहास में ऐसे असंख्य उदहारण आते है जिनके संस्कार समाज आज भी याद करता है! भक्त ध्रुव की माता सुनीति ने उन्हें प्रभु की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

 

उसकों बचपन से ही ऐसे संस्कार दिए कि वह भक्ति मार्ग का चयन कर अपने जीवन में आगे बढ़ें! बच्चे जो भारत के भविष्य के कोहिनूर हैं, उन से क्यों बचपन छीना जा रहा है। कारण है जागृति का अभाव। शिक्षा और दीक्षा से ही बालकों को सशक्त बनाया जा सकता है। ताकि वे स्वयं अपनी प्रतिभा को पहचानें। समाज व स्वयं का उत्थान कर सकें। कहा जाता है कि जहां संस्कार हैं वहां उच्च, श्रेष्ठ समाज की परिकल्पना साकार होती है। साध्वी जी ने कहा कि हमारा मन भी यदि भगवान से जुड़ जाए तो हम अपने बुरे संस्कारों से मुक्त हो जीवन में सुख आनंद का अनुभव कर सकते हैं।

आज समाज का प्रत्येक व्यक्ति अर्जुन की तरह अपने जीवन के अवसाद में डूबा है। उसके हाथ से साहस का गांडीव छूटने लगता है। विश्वास की नींव कमजोर होने लगती है। ऐसे में जगतगुरु भगवान श्री कृष्ण जैसे सशक्त आश्रय की आवश्यकता है। उनके द्वारा दिए ब्रह्मज्ञान की अनिवार्यता है। स्मरण रखें जहाँ श्री कृष्ण का ज्ञान है, वहाँ वे स्वयं हैं। जहाँ वे हैं वहाँ विजय ही विजय है। यदि विकारों रुपी अग्नि से हमें कोई बचा सकता है तो वह है ब्रह्मज्ञान! जब इंसान पूर्ण गुरु द्वारा इस ज्ञान को प्राप्त कर निरंतर ध्यान- साधना करता है, तब इस ज्ञान की अग्नि में धीरे-धीरे उसके जन्मों-जन्मों के कर्म संस्कार स्वाहा हो जाते है और फिर वह मानव से महामानव बन जाता है, और फिर विश्व को ऐसे ही संस्कारी स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ इतियादी जैसे भक्त प्राप्त होते है जो समाज कल्याण के लिए अपना जीवन लगा दिया करते हैं!