सृष्टि के प्रत्यक्ष देवता सूर्य की उपासना का दिन मकर संक्रांति

सूर्य के सभी संक्रमणों में से यह संक्रमण जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं,सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। सूर्य का मकर रेखा से उत्तरी कर्क रेखा की ओर जाना ‘उत्तरायण ‘ तथा कर्क रेखा से दक्षिणी मकर रेखा की ओर जाना ‘दक्षिणायण ‘ है। उत्तरायण में दिन बड़े हो जाते हैं तथा रातें छोटी होने लगती हैं और मनुष्य की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है,जिससे मानव गति की ओर अग्रसर होता है। दक्षिणायण में ठीक इसके विपरीत होता है।

शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण देवताओं का दिन तथा दक्षिणायण देवताओं की रात होती है। वैदिक काल में उत्तरायण को देवयान तथा दक्षिणायण को पितृयान कहा जाता था।मकर संक्रांति के दिन यज्ञ में दिए द्रव्य को ग्रहण करने के लिए देवता धरती पर अवतरित होते हैं एवं इसी मार्ग से पुण्यात्माएं शरीर छोड़कर स्वर्ग आदि लोकों में प्रवेश करती हैं इसलिए यह आलोक का अवसर भी माना जाता है।

पुत्र के घर जाते हैं पिता– इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उनके घर जाते हैं। चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं,उसमें सूर्य के प्रवेश मात्र से शनि का प्रभाव क्षीण हो जाता है क्योंकि सूर्य के प्रकाश के सामने कोई नहीं रुक सकता। मकर संक्रांति की साधना से सारे शनिजनित दोष दूर हो जाते हैं।

श्री कृष्ण ने बताई उत्तरायण की महिमा– भगवान श्री कृष्ण ने भी उत्तरायण का महत्व बताते हुए गीता के आठवें अध्याय में कहा है कि उत्तरायण के 6 मास के शुभ काल में जब भगवान भास्कर देव उत्तरायण होते हैं तो पृथ्वी प्रकाशमय रहती है और इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

इसके विपरीत सूर्य के दक्षिणायण होने पर पृथ्वी अंधकारमय होती है और इस अन्धकार में शरीर का त्याग करने पर पुनः जन्म लेना पड़ता है।
भविष्य पुराण के अनुसार श्री कृष्ण ने सूर्य को संसार के प्रत्यक्ष देवता बताते हुए कहा है कि इनसे बढ़कर कोई दूसरा देवता नहीं है,सम्पूर्ण जगत इन्हीं से उत्पंन हुआ है और अंत में इन्ही में विलीन हो जाएगा।जिनके उदय होने से सारा जगत चेष्टावान होता है।जिनके हाथों से लोक पूजित ब्रह्मा और विष्णु तथा ललाट से शंकर उत्पंन हुए हैं।

आरोग्य प्रदान करते हैं सूर्य– सूर्य की रोगशमन शक्ति अदभुत है जिसका उल्लेख सभी वेद-पुराण एवं योग शास्त्रों में वर्णित हैं। इनमें यह भी लिखा है कि आरोग्य सुख हेतु सूर्य उपासना सर्वथा फलदायी है,जो भी सूर्य देव की उपासना तथा व्रत करते हैं उनके सभी रोग दूर हो जाते हैं। शारीरिक कमजोरी या जोड़ों में दर्द जैसे परेशानियों में भगवान सूर्य की आराधना करने से रोग मुक्ति मिलने की संभावना बनती है। सूर्य की ओर मुख करके सूर्य स्तुति करने से त्वचा रोगों में लाभ मिलता है,नेत्र ज्योति बढ़ती है।

स्नान, दान का बहुत मिलता है फल – श्री तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है कि ” माघ मास में जब सूर्य मकर राशि में आते हैं तब सब लोग तीर्थों के राजा प्रयाग के पावन संगम तट पर आते हैं देवता, दैत्य ,किन्नर और मनुष्यों के समूह सब आदरपूर्वक त्रिवेणी में स्नान करते हैं ”। वैसे तो प्राणी इस माह में किसी भी तीर्थ, नदी और समुद्र में स्नान कर दान -पुण्य करके कष्टों से मुक्ति पा सकता है लेकिन प्रयागराज संगम में स्नान का फल मोक्ष देने वाला है।

मकर संक्रांति के दिन गंगाजी शिव की जटाओं से निकलकर भागीरथ के पीछे -पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिलीं। इसलिए इस दिन गंगासागर स्नान का भी बहुत महत्व है। पदम पुराण के अनुसार ”उत्तरायण या दक्षिणायण आरम्भ होने के दिन जो पुण्य कर्म किया जाता है वह अक्षय होता है।

मकर संक्रांति के दिन सूर्योदय से पहले स्नान करना चाहिए  ऐसा करने  से दस हजार गौ दान का फल प्राप्त होता है। इस समय किया हुआ तर्पण दान और देव पूजन अक्षय होता है। इस दिन ऊनी कपडे, कम्बल , तिल और गुड़ से बने व्यंजन व खिचड़ी दान करने का से सूर्य नारायण एवं शनि की कृपा प्राप्त होती है।

सुख-समृद्धि के लिए इस दिन ये उपाय जरूर करें–  मकर संक्रांति पर पुण्य काल के समय पवित्र नदी में स्नान करें या घर में जल में तिल और गंगाजल डालकर स्नान करें। स्नान के पश्चात तांबे के लोटे में शुद्ध जल भरकर उसमें लाल पुष्प,लाल चन्दन , तिल आदि डालकर ‘ॐ घृणि सूर्याय नमः’ मन्त्र का जप करते हुए सूर्य को अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय आपकी दृष्टि गिरते हुए जल में प्रतिबिंबित सूर्य की किरणों पर होनी चाहिए।

भविष्य पुराण के अनुसार सूर्यनारायण का पूजन करने वाला व्यक्ति प्रज्ञा, मेधा तथा सभी समृद्धियों से संपन्न होता हुआ चिरंजीवी होता है। यदि कोई व्यक्ति सूर्य की मानसिक आराधना भी करता है तो वह समस्त व्याधियों से रहित होकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है। व्यक्ति को अपने कल्याण के लिए सूर्यदेव की पूजा अवश्य करनी चाहिए।