स्वतंत्रता क्रांति के ऋषि- तपस्वी – श्री आशुतोष महाराज जी

स्वतंत्रता संग्राम का भी वह दौर था! भारत के छड़े नौजवान सपूत बड़े-बड़े तपसी ऋषि बन गए थे। ऐसे क्रांतिकारी ऋषि, जिन्होंने घोर वनों, कंदराओं और हिम-शिखरों पर दुर्गम तप में रत तपस्वियों तक को पीछे छोड़ दिया था। फर्क बस इतना था… आध्यात्मिक साधू-तपस्वी जहाँ ‘आत्म-मुक्ति’ को अपना लक्ष्य बनाते है; वहीँ स्वतंत्रता संग्राम के इन साधकों ने ‘राष्ट्र-मुक्ति’ को अपना ‘साध्य’ लक्षित कर लिया था। इनकी एक ही साधना थी- स्वतंत्रता क्रांति! एक ही ताप था, एक ही पूजा थी, एक ही भजन था- आज़ादी का संग्राम! स्वराज्य के लिए संघर्ष! इनकी एक ही इष्ट थी- माँ भारती! अपने इस साध्य को कुछ इस अदा से सींचा था इन स्वतंत्रता-साधकों ने कि साधकता के बहुत से अनूठे गुण इनके जीवन-चरित्र से झलक उठे! अकूत धैर्य व विश्वास! सतत संघर्ष! एकलक्षित आस्था! अनुपम वैराग्य! मृत्यु से अभय! अनन्य समर्पण!… ऐसे-ऐसे महान आध्यात्मिक अलंकार इन आज़ादी के दीवाने साधकों के श्रृंगार बन गए थे।

इस स्वतंत्रता दिवस पर हम आपके समक्ष इन स्वतंत्रता-साधकों के यही अनूठे गुण उजागर कर रहे है… ताकि वर्तमान में कोई भी साधक, जो किसी भी शुभ साध्य को आगे रखकर, साधना कर रहा है- उसे प्रेरणा मिल सके। एक ही इष्ट! एक ही सिज़दा! रास बिहारी अंग्रेज़ी शासन द्वारा भारत से निर्वासित कर दिए गए थे। मातृभूमि से दूर जापान में दिन गुज़ार रहे थे। परन्तु यह दूरी केवल शरीर से थी। मन से, विचारों से, भावों से रास बाबु सदैव भारत से जुड़े रहते थे। भारत के प्रति इतनी आत्मियता थी उनमें कि उठते-बैठते, सोते-जागते उनके लिए भारत सजीव रहता था। वे रात को हमेशा दक्षिण- पश्चिम दिशा में सिर करके सोते थे। जापानी बंधुओं को यह बहुत अटपटा लगता, क्योंकि उन दिनों जापान में दक्षिण- पश्चिम दिशा में सिर रखकर सोना अशुभ माना जाता था। एक दिन एक जापानी ने रास बाबू से पूछ ही लिया- ‘दक्षिण-पश्चिम’ दिशा में सिर क्यों? यह ठीक नहीं है।’ रास बाबू ने उत्तर में कहा – क्या तुम नहीं जानते, मेरा भारत जापान के दक्षिण-पश्चिम दिशा में पड़ता है।

एक बेटा कभी अपनी माँ की ओर पाँव करके नहीं लेट सकता। यह हमारे भारत की संस्कृति है। दण्डवत् लेटकर माँ के चरणों में सिर ज़रूर रख सकता है। बंधु! वही मैं करता हूँ…. दक्षिण-पश्चिम दिशा में सिर रखकर मैं माँ भारती के चरणों में सतत सिज़दा करता हूँ। हर रात उनका दुलार लेता हूँ। साधना पुष्प- काश! हमारी साधना भी ऐसे ही भाव से फलवती हो। चाहे हम विश्व के किसी भी कोने में हों, पर साध्य का सतत स्मरण रहे! साध्य को सतत नमन करें! साध्य का सतत मानसिक चिंतन करते रहें। एक ही प्रेम! एक ही प्रियतम! स्वतंत्रता सेनानी राजगुरु…. एक मस्त नवयुवक… भगत सिंह के साथ हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गए। राजगुरु में एक रसिक पक्ष भी था। वे सौन्दर्य के प्रेमी थे। एक बार कमसिन युवतियों का एक चित्र उनके हाथ लग गया। उन दिनों ये सभी क्रांतिकारी अपना घर-बार छोड़कर एक मकान में रह रहे थे। उसी के एक मुख्य कमरे में राजगुरु ने यह चित्र चिपका दिया। उसके बाद किसी ज़रूरी कार्यवश वे चले गए। शाम के वक्त राजगुरु लौटे और उनकी रसिक नज़रें चित्र को ढूँढ़ने लगीं।

ठिनकते स्वर में उन्होंने पूछताछ की- ‘भाइयों! मेरा वो चित्र कहाँ उड़ गया?’ आज़ाद कमरे में आए और बोले- ‘मैंने फाड़ा है!’ राजगुरु किलस पड़ा- ‘पर क्यों उस्ताद? इतना सौन्दर्यपूर्ण चित्र था!’ आज़ाद गला खंखारते हुए बोले ‘सौन्दर्यपूर्ण??शायद मुझसे इतना सौन्दर्य हज़म नहीं हुआ। इसलिए मैंने उसे फाड़ डाला।’ अब राजगुरु शायराना ढंग से ताना कसते हुए बोले- ‘खूबसूरत दुनिया बसाने चले हो और खूबसूरती से इतना परहेज़! यह भी कोई बात हुई भला?’ यह सुनते ही चंद्रशेखर ठहाका लगाकर हँस दिए। राजगुरु की बाँह पकड़कर अपने पास बिठा लिया। दिल से दिल की बात की- ‘मेरे भाई! परहेज खूबसूरती या सौन्दर्य से नहीं! पर हमारे लिए सौन्दर्य का पैमाना अलग है। एक ही सौन्दर्य है,जिसका आनंद लेने के लिए हम अपनी सारी जवानी झोंक रहे हैं, जान झोंक रहे हैं।

वह है-भारत माँ की स्वतंत्र वादियों का सौन्दर्य! भारत माँ के स्वतंत्र खेतों का सौन्दर्य! भारत माँ की स्वतंत्र मिट्टी का सौन्दर्य! हमारी एक ही कामना है, आँखों की एक ही दावत है- स्वतंत्रता! स्वतंत्रता! स्वतंत्रता! हमारी एक ही प्रियतमा है, एक ही प्रेमिका है, एक ही प्रेम है- स्वराज! स्वराज! स्वराज! मेरे भाई! अगर हम इस सौन्दर्य की वासना से एक पल भी भटके, तो हमारी क्रान्ति परवान नहीं चढ़ पाएगी। वैसे भी, जब इन आँखों को अपना सौन्दर्य और इस दिल को अपनी प्रेमिका मिल चुकी है- तो इन्हें कहीं और क्यों उलझाना??’ चन्द्रशेखर आज़ाद चुप हो गए। राजगुरु, भगत सिंह आदि सभी क्रान्तिवीर उन्हें अपलक देखते रहे। मानो मन ही मन सब कह रहे हों- ‘आप सही कह रहे हैं, आज़ाद!’ साधना पुष्प- ऐसा था, हमारे क्रान्तिवीरों का ब्रह्मचर्य-भाव! अपनी सोच और चिंतन तक में उन्होंने किसी अन्य वासना या आसक्ति को फटकने नहीं दिया। अपनी दृष्टि के दायरे में किसी सौन्दर्य को नहीं बसाया। तन और मन से ‘त्याग’ और ‘वैराग्य’ की उपासना की! काश! ऐसा ही विराग का सूरज आज हमारी साधनाओं में भी धधक उठे। एक ही साधना! एक ही भजन! स्वतंत्रता सेनानी रामप्रसाद बिस्मिल का नाम सभी जानते हैं।

उनके एक मित्र थे- अशफाक उल्ला खां हसरत वारसी। जितना नाम बड़ा है, उतने ही इरादे भी बुलंद थे इनके। स्वतंत्रता संग्राम लड़ते-लड़ते इन्हें जेल हो गई। कहते हैं, लौह सलाखों के पीछे इनकी ज़िंदादिल शायरी ने सभी क्रान्तिवीरों के हौंसले आबाद रखे। एक बार सभी क्रान्तिकारी साथियों को एक साथ कचहरी में पेश होना था। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज़ उठाने की ऐवज़ में उन्हें दो ही सज़ाएँ मिल सकती थीं- उम्र कैद या फाँसी! यह बात सभी जानते थे। इन्हीं पलों में सभी की हौसला अफज़ाई के लिए अशफाक ने कुछ क्रान्तिकारी पंक्तियाँ लिखीं- हे मातृ भूमि! तेरी सेवा किया करूँगा। फाँसी मिले मुझे या हो उम्रकैद मेरी, बेड़ी बजा-बजाकर तेरा भजन किया करूँगा। क्रांतिवीरों ने इसका प्रत्यक्ष मंचन भी कर दिखाया।

कचहरी में हाज़िर हुए, तो लगा कि भक्तों की कीर्तन-मंडली ने प्रवेश किया हो। सभी मंजीरों के स्थान पर अपने हाथों में बँधी लौह-बेड़ियाँ बजा रहे थे। कोई तालियाँ बजाकर, तो कोई लकड़ी के बैंच को ढोलक बनाकर धूम-धड़ाका कर रहा था। मुख पर एक ही तराना था- ‘हे मातृभूमि! बेड़ियाँ बजा-बजाकर तेरा भजन किया करूँगा।….’ क्या दीवानगी थी, क्या फकीरी थी इन फक्कड़-फकीरों की! अंग्रेज़ी शासकों के लिए यह दृश्य अकल्पनीय था। आखिरकार वह दिन भी आ गया, जब अशफाक को फाँसी की वेदी पर चढ़ना था। फाँसी से कुछ घंटों पहले उनके साथियों ने उनसे पूछा- ‘अशफाक! सदा के लिए आँखें मूँदने जा रहे हो। यह तो बताओ, तुम्हारी आखिरी ख्वाहिश क्या है?’ अशफाक ने साथियों की तरफ बेफिक्र नज़र से देखा। बोले- ‘तुमने पूछा, मेरी आखिरी ख्वाहिश क्या है? यही कि- भाईयों, मेरे वतन की खाक के कुछ कतरे मेरे कफन में रख देना। यही है आरज़ू मेरी।

साधना पुष्प- ऐसे अभय हौसले थे- क्रान्तिवीरों के! मौत के सायों में भी बेड़ियाँ बजा-बजाकर उत्सव मनाते थे। फाँसी पर झूलने से पहले खाके-वतन की खुशबू सूँघना चाहते थे। ऐसे त्यागी, अभय वीरों को सलाम! काश! हमारी साधना में भी ऐसा अभय जज़्बा हो- अपने लक्ष्य के प्रति ऐसा समर्पण कि मृत्यु का भय भी आड़े न आए। एक ही तप! एक ही अरदास! कहते हैं, एक बार क्रान्तिकारी वीर खुदीराम बोस कहीं से गुज़र रहे थे। राह बीच एक मंदिर दिखाई दिया। उसके आँगन में खुदीराम ने एक विचित्र नज़ारा देखा। आँगन का फर्श तप रहा था। ऊपर खुला आकाश गर्मी के अंगारे बरसा रहा था।

पर फिर भी कुछ लोग नीचे आँगन आकाशोन्मुख होकर लेटे हुए थे। उन्हें देखकर खुदीराम हैरान रह गए। उन्होंने पास खड़े एक जानकार से पूछा- ‘ये लोग इस कड़ी धूप में जानबूझ कर झुलस क्यों रहे हैं?’ जानकार बोला- ‘ये एक रूढ़ि से ग्रस्त हैं। इनकी अरदास है कि ईश्वर इनके रोगों का उपचार करे। इसी मुराद की पूर्ति के लिए ये तप कर रहे हैं।’ खुदीराम मुस्कुरा दिये। धीमे स्वर में बोल गए- ‘लगता है, मुझे भी ऐसे ही तप से गुज़रना होगा।’ जानकार ने सुन लिया, जिज्ञासा रखी- ‘क्यों भाई? क्या आप भी किसी रोग से पीड़ित हैं?’  खुदीराम- हुँ! हम सब ही हैं! दासता के रोग से! परतंत्रता को रोग लगा है हमें। मुझे, तुम्हें और समस्त देश-वासियों को! हम सभी इस रोग से स्वस्थ हो सकें, इसलिए मुझे भी तपना होगा। अपने तन को, मन को जीवन को स्वतंत्रता क्रान्ति के तप्त अंगारों में झुलसाना होगा।

यह संकल्प धारण कर खुदीराम आगे बढ़ गए। साधना पुष्प- काश! ऐसा संकल्प हमारी साधना का भी अंग बने। हमारी भी परमार्थ पूर्ण अरदास हो। ठीक जैसी राजा शिबि ने की थी- ‘न मैं राज्य की कामना करता हूँ, न स्वर्ग की और न मोक्ष की। मेरी तो बस एक ही मुराद है- दुःख आदि से तप्त प्राणी मात्र के सभी संतापों का नाश हो।’