हमारा नजरिया ही हमारा भविष्य तय करता है

फिरोज और रिया वर्षों बाद एक दूसरे से मिल रहे थे। दोनों अपने-अपने परिवारों के साथ आए थे। दोनों के बच्चे लगभग एक ही उम्र के थे। पहले उन्होंने एक रेस्टोरेंट में खाना खाया और फिर पास के एक पार्क में घूमने के लिए गए। फिरोज का बेटा दस साल का था और रिया का बेटा बारह साल का था। दोनों बहुत शैतान थे। सारे बड़े वहीं एक पेड़ के नीचे बैठकर बातें कर रहे थे। फिरोज और रिया अपने कॉलेज की बातें कर रहे थे। उनकी बातें चल ही रही थीं कि फिरोज की पत्नी ने देखा, दोनों बच्चे पेड़ की एक ऊंची शाखा पर जाकर बैठे हुए हैं।

वजन ज्यादा होने के कारण शाखा टूटने लगी। फिरोज तुरंत चिल्लाया, बंटी, देखो, गिर जाओगे। वहीं रिया पीछे से चिल्लाई, ‘कसकर पकड़े रखना कियान। हम आ रहे हैं।जब तक वे बच्चों के पास पहुंचते, फिरोज का बेटा बंटी गिर गया और उसे काफी चोट आई। पर रिया का बेटा शाखा को कसकर पकड़े रहा और बच गया। फिरोज बंटी पर खूब गुस्साया। बंटी को देख कियान भी थोड़ा सहम गया। रिया फिरोज से बोली, छोड़ो न।

इतनी गहरी चोट नहीं है। ठीक हो जाएगा। बच्चे शैतानी करेंगे, तो पेड़ से गिरेंगे ही। बच्चे दोबारा खेलने चले गए, तो रिया फिरोज से बोली, हम अगर यह सोंचेंगे कि हम कहीं शाखा से गिर न जाएं, तो हम पहले गिरने की कल्पना करेंगे और फिर बचने की।लेकिन अगर हम यह सोचेंगे कि हम कसकर डाल को पकड़े रहें, तो हम सिर्फ शाखा को पकड़े रहने की ही कल्पना करेंगे। तुमने गौर नहीं किया, बंटी पेड़ से गिर गया, लेकिन कियान पेड़ को कसकर पकड़े रहा।

जब तुमने बंटी से कहा, देखो, गिर जाओगे, तो बंटी को यकीन-सा था कि उसका संतुलन बिगड़ चुका है। वहीं कियान के दिमाग में तस्वीर बनी कि वह शाखा पकड़े हुए है और मै उसको बचाने के लिए आ रही हूं। यानी जो हम बोलते हैं, उसका काफी असर हमारी या किसी सुनने वाले की सोच और कर्म पर भी होता है।