40 साल पुराने बायलर के सहारे चल रहा दुग्ध संघ

उज्जैन। उज्जैन दुग्ध संघ की स्थापना 1977 में हुई थी, तब से आज तक प्लांट में पुरानी तकनीक वाले कोयले से चलने वाले बायलर से काम चलाया जा रहा है। उस समय प्लांट की क्षमता 60 हजार लीटर संग्रहण की थी। वर्तमान में 25 लाख लीटर है।
जाहिर है कि बायलर पर चार गुना ज्यादा लोड बढ़ गया है और प्रबंधन को पुराने बायलर से ही काम चलाना पड़ रहा है, क्योंकि इन दिनों बाजार में सांची के उत्पादनों की मांग बहुत है। यहां तक की पुराने बायलर के कारण संघ मांग की पूर्ति नहीं कर पा रहा है। संघ के बायलर की मियाद भी एक दशक पहले ही खत्म हो गई है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि अभी तक जितने भी संचालक मंडलों ने यहां काम किया है। उन्होंने अपना आधुनिकीकरण सुविधाओं का ध्यान रखा पर बायलर को बदलने पर कभी चर्चा नहीं की, जबकि इनके दलों की प्रदेश में सरकारें भी रही थी तब भी संचालकों ने अपना विकास जारी रखा प्लांट की हालत जस की तस बनी हुई हैं। इसे तकनीकी स्तर पर बेहतर बनाने का एक भी प्रयास नहीं किया गया।

वर्तमान दौर में तकनीकी दृष्टि से उज्जैन दुग्ध संघ का प्लांट और पुरानी मशीनों के कारण अनुपयोगी और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला बताया जा रहा है। इन्हीं कारणों सरकार का यह उपक्रम बाजार अपने उत्पादनों की मांग की पूर्ति नहीं कर पा रहा है। इसी कारण संभागभर में 8 नई दुग्ध उत्पादकों कंपनियों ने अपना बाजार स्थापित कर लिया हैं। अब यही उज्जैन दुग्ध संघ को नुकसान पहुंचा रही है।
तकनीकि सूत्रों की माने तो इस प्लांट को 54 सिलेंडर वाले एलपीजी बायलर की जरूरत है ताकि कोयले के उपयोग से चलने और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले बायलर से निजात मिल जाएगी।

अगर ऐसा होता है तो शहरवासियों को प्रदूषण से मुक्ति मिल जाएगी और संघ का 20 टन कोयला प्रति माह का खर्च भी बच जाएगा। जानकारों का कहना है कि सांची को बाजार के अन्य दुग्ध उत्पादकों से स्पर्धा करना है तो आधुनिक उपकरणों को प्लांट में लगाने के लिए संचालक मंडल को प्रतिबद्ध होना पड़ेगा, वरन बाजार ही सांची को बाहर कर देगा। वर्तमान संचालक मंडल तो बैलेंस सीट में कोयले की खपत और अन्य खर्चों को छुपाकर पेश कर रहा है, जबकि हर तीन माह के लिए तकनीकी विशेषज्ञ टीम से सलाह लेकर ही पुराने बायलर को धका रहे है, ताकि 10 केजी स्टीम प्रेशर बनाकर 15 हजार लीटर दुध को पास्चराईज्ड कर मांग की आपूर्ति की जा सके। ऐसा करने के लिए अनेक बार बायलर को गर्म किया जाता है, जिससे कोयले की खपत निश्चित ही बढ़ जाती है।दुग्ध संघ के गुण नियंत्रक जेके कठरिया ने कहा कि कोयले के प्रयोग से पर्यावरण पर थोड़ा असर होता है। यहां गैस का बायलर लगाने की तैयारी है। प्रबन्धक यांत्रिकी सीपी दाहिया के काल रिसीव न करने से उन्के कथन नही मील पाये।