Hartalika Teej 2019: सबसे पहले मां पार्वती ने रखा था हरतालिका तीज का व्रत, पढ़िए कथा

रतालिका तीज इस बार 1 सितंबर को मनाई जा रही है जिसे गौरी तृतीया व्रत भी कहा जाता है। विधि-विधान से किया जाने वाला यह व्रत विवाहित महिलाएं और कुंवारी लड़कियां करती हैं। इस विशेष दिन पर गौरी-शंकर की पूजा की जाती है। इस व्रत को लेकर मान्यता है कि सबसे पहले माता पार्वती ने यह व्रत भगवान शिव के लिए रखा था। हरतालिका तीज व्रत में शिव-माता पार्वती के विवाह की कथा सुनने का बड़ा महत्व है।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने तृतीया तिथि को ही भगवान शिव को पुनः प्राप्त किया था। मां पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लेकर माता सती ने घोर तपस्या की और भगवान शिव को फिर से पति के रूप में प्राप्त किया। इसलिए शादीशुदा महिलाएं इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करके पति की लंबी उम्र और सौभाग्य का वरदान मांगती हैं। वहीं, कुंवारी लड़कियां मनचाहा वर प्राप्त करने के लिए ये व्रत रखती हैं।

ऐसे करें पूजा

महिलाएं इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं। इस व्रत को करने वाली महिलाओं को शिव-पार्वती अखंड सौभाग्‍य का वरदान देते हैं। एक बार इस व्रत को शुरू करने के बाद आजीवन इस व्रत को रखना पड़ता है। सुहागिन महिलाएं नए वस्त्र पहनती हैं और सोलह शृंगार करती हैं

सुहाग की सामग्री को मां पार्वती को अर्पित करें। भगवान शिव को वस्‍त्र अर्पित करें। पूजन सामग्री को किसी सुहागिन महिला को दान दें। इस व्रत को करने वाली महिलाएं पूरी रात जागरण करते हुए शिव-पार्वती का ध्यान व भजन करती हैं। हरतालिका तीज व्रत में प्रदोष काल में पूजा की जाती है।

हरतालिका तीज की व्रत कथा

पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार शिव जी ने माता पार्वती को इस व्रत के बारे में विस्तार पूर्वक समझाया था। मां गौरा ने माता पार्वती के रूप में हिमालय के घर में जन्म लिया था। बचपन से ही माता पार्वती भगवान शिव को वर के रूप में पाना चाहती थीं और उसके लिए उन्होंने कठोर तप किया। 12 सालों तक निराहार रह करके तप किया। एक दिन नारद जी ने उन्हें आकर कहा कि पार्वती के कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु आपकी पुत्री से विवाह करना चाहते हैं। नारद मुनि की बात सुनकर महाराज हिमालय बहुत प्रसन्न हुए। उधर, भगवान विष्णु के सामने जाकर नारद मुनि बोले कि महाराज हिमालय अपनी पुत्री पार्वती से आपका विवाह करवाना चाहते हैं।

भगवान विष्णु ने भी इसकी अनुमति दे दी।फिर माता पार्वती के पास जाकर नारद जी ने सूचना दी कि आपके पिता ने आपका विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया है। यह सुनकर पार्वती बहुत निराश हुईं उन्होंने अपनी सखियों से अनुरोध कर उसे किसी एकांत गुप्त स्थान पर ले जाने को कहा। माता पार्वती की इच्छानुसार उनके पिता महाराज हिमालय की नजरों से बचाकर उनकी सखियां माता पार्वती को घने सुनसान जंगल में स्थित एक गुफा में छोड़ आईं। यहीं रहकर उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप शुरू किया जिसके लिए उन्होंने रेत के शिवलिंग की स्थापना की। संयोग से हस्त नक्षत्र में भाद्रपद शुक्ल तृतीया का वह दिन था जब माता पार्वती ने शिवलिंग की स्थापना की। इस दिन निर्जला उपवास रखते हुए उन्होंने रात्रि में जागरण भी किया।

उनके कठोर तप से भगवान शिव प्रसन्न हुए माता पार्वती जी को उनकी मनोकामना पूर्ण होने का वरदान दिया। अगले दिन अपनी सखी के साथ माता पार्वती ने व्रत का पारण किया और समस्त पूजा सामग्री को गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया। उधर, माता पार्वती के पिता भगवान विष्णु को अपनी बेटी से विवाह करने का वचन दिए जाने के बाद पुत्री के घर छोड़ देने से व्याकुल थे। फिर वह पार्वती को ढूंढते हुए उस स्थान तक जा पंहुचे। इसके बाद माता पार्वती ने उन्हें अपने घर छोड़ देने का कारण बताया और भगवान शिव से विवाह करने के अपने संकल्प और शिव द्वारा मिले वरदान के बारे में बताया. तब पिता महाराज हिमालय भगवान विष्णु से क्षमा मांगते हुए भगवान शिव से अपनी पुत्री के विवाह को राजी हुए।