Mohalla Assi Review: ‘मोहल्‍ला अस्‍सी’

सन् 1980 के दशक के आखिरी वर्षों और 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में भारत तीन बड़ी घटनाओं- मंडलीकरण, कमंडलीकरण और भूमंडलीकरण का गवाह बना। इन युगांतरकारी घटनाओं ने भारतीय समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाला। अपनी परम्पराओं पर प्राण देने वाली महादेव की नगरी काशी भी इससे अछूती नहीं रही। प्रसिद्ध साहित्यकार काशीनाथ सिंह की किताब ‘काशी का अस्सी’ पर आधारित डॉ. चंद्रप्रकाश निर्देशित ‘मोहल्ला अस्सी’ इसी दौर पर एक टिप्पणी है। यह टिप्पणी बनारस के अस्सी मोहल्ले को पृष्ठभूमि में रख कर की गई है।

कहानी

यह फिल्म राजनीति व बाजारीकरण के प्रभावों से समाज, मूल्यों और परम्पराओं में पैदा हुए द्वंद्व को बयां करती है। अस्सी मोहल्ले के पप्पू की चाय दुकान, पंडितों का मुहल्ला और वहां के घाट इस द्वंद्व के चित्रण का मंच है। इस मुहल्ले में जहां मंडल और कमंडल ने सामाजिक समीकरणों में हलचल पैदा की, तो बाजारवाद ने मूल्यों और परम्पराओं को निशाना बनाया। कुछ लोग हैं, जो बाजारीकरण से पैदा अवसरों को भुना रहे हैं, तो कुछ परम्पराओं से चिपके हुए हैं।

कुछ लोग जरूरतों के लिए मूल्यों को किनारे कर देते हैं, तो कुछ लोग उसके लिए दिक्कतें उठाने को भी तैयार हैं। वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो जरूरतों को पूरा करने के लिए मूल्यों को छोड़ने को तैयार हैं, लेकिन लोकलाज की वजह से परम्पराओं को छोड़ने में डरते हैं। जैसे ही उन्हें अवसर मिलता है, वे पहली जमात के लोगों में शामिल हो जाते हैं। पंडित धर्मनाथ पांडेय (सन्नी देओल) एक ऐसे व्यक्ति हैं, जो किसी भी कीमत पर अपनी परम्परा को छोड़ना नहीं चाहते। उनकी पत्नी सावित्री (साक्षी तंवर) उन्हें बीच का रास्ता अपनाने को कहती है, लेकिन वे अपनी जिद से पीछे नहीं हटते।