Review:खानदानी शफाखाना

कई दफा हमें नहीं पता होता कि हम किस तरह की धारणाओं को निभाते जा रहे हैं. सेक्स को लेकर हमारे समाज में बहुत बड़ा टैबू है. इस शब्द का सार्वजनिक जिक्र भर से तमाम संकोच में पद जाते हैं. क्योंकि हमारे समाज में सेक्स एजुकेशन का अभाव है. यही वजह है कि गुप्त रोग जो नेचुरल है, फिर भी इसे खुलकर स्वीकार करने और उसका इलाज कराने में झिझकते हैं.

बॉलीवुड ने पिछले कुछ समय से झिझकना बंद कर दिया है. जिन मुद्दों पर ज्यादा बात नहीं होतीं, अधिकांश आबादी के बीच टैबू हैं, ऐसे मुद्दों पर फिल्में बननी शुरू हो गई हैं. विक्की डोनर, शुभ मंगल सावधान, पैड मैन और टॉयलेट एक प्रेम कथा जैसी फिल्में इसका उदाहरण हैं. अब इस कड़ी में सोनाक्षी सिन्हा की नई फिल्म खानदानी शफाखाना भी शुमार हो गई है.

ये फिल्म सेक्स संबंधित बीमारियों को दबा कर रखने और किसी के सामने खुल के ना बता पाने, डॉक्टर के पास जाने से हिचकने वाले लोगों को लेकर है. कई दफा सेक्स के दौरान लोगों को तरह तरह की परेशानियां होती हैं जो आम है. ये किसी के साथ भी हो सकता है. जब ये आम है तो इस बारे में बात करना सामान्य क्यों नहीं है? ये सवाल फिल्म के माध्यम से पूछा गया है.

पंजाब की कहानी है. फिल्म बार बार ये संदेश देती नजर आती है कि सेक्स वर्ड बोलना या उसका वाजिब जिक्र करना उतना ही स्वाभाविक है जितना अस्वाभाविक उसके बारे में बात ना करना है. उसके बारे में बात नहीं कर हमने इसे अलग ही रूप में परिभाषित कर लिया है. और यही वजह है कि इस शब्द का जिक्र अश्लीलता का अभिप्राय माना जाता है.

चूंकि समाज ही ऐसा है तो जब फिल्म की कहानी में सोनाक्षी सिन्हा लोगों की सेक्स संबंधी बीमारियों का इलाज करने की ठानती हैं उन्हें घर, मोहल्ले और अपनों का तिरस्कार झेलना पड़ा. मगर उनका जज्बा कभी कम नहीं हुआ. फिल्म के जरिए यौन संबंधी समस्याओं को लेकर लोगों को जानकारी और जागरुक करने की कोशिश की गई है.

फिल्म में सोनाक्षी सिन्हा, बबिता उर्फ बेबी बेदी के रोल में हैं. सोनाक्षी पंजाब के एक छोटे से टाउन में रहती हैं. मेडिकल रिप्रिजेंटेटिव हैं और वे अपने कंपनी की दवाइयों का प्रचार करती हैं. पिता के गुजर जाने के बाद घर की हालत उतनी अच्छी नहीं रह जाती. सोनाक्षी अपनी मां के साथ रहती हैं. उनका एक भाई (वरुण शर्मा) है, जो एक नंबर का आलसी है और घरवालों को उससे कोई उम्मीद नहीं. आखिर में सारी जिम्मेदारी बेबी के कंधो पर आती है.

बेबी को कमा कर घर का खर्चा चलाना है और परिवार पर जो कर्ज है उसे भी उतारना है. सब कुछ जैसे तैसे चल ही रहा होता है कि इसी बीच कहानी में एक मोड़ आता है. सोनाक्षी के मामा जी यानी कुलभूषण खरबंदा खानदानी शफाखाना चलाते हैं जहां वे यौन संबंधी समस्याओं का इलाज करते हैं. उनकी दवाइयां लोगों को शूट करती हैं और उनका बिजनेस भी ठीक-ठाक चल रहा होता है. इसी बीच कुछ संगठनों की मिली भगत से उनका नाम खराब करने की कोशिश की जाती है.

मामा जी खुद को असहाय महसूस करते हैं और अपमान का भार ज्यादा दिन नहीं सह पाते. एक दिन अचानक बेबी को उनके मरने की खबर मिलती है और साथ ही ये भी पता चलता है कि अपना खानदानी शफाखाना मामाजी ने बेबी के नाम कर दिया है. अब बेबी के सामने दो विकल्प हैं. या तो वो समाज के डर से इस ऑफर को ठुकरा दे या फिर अपने मामा की विरासत को आगे बढ़ाए. बेबी दूसरा ऑप्शन चुनती है और उन्हें अंदाजा भी नहीं होता कि ये कितना रिस्की है.

यहीं से शुरू होती है बेबी के हकीम बेबी बेदी बनने की कहानी. खानदानी शफाखाना में इलाज करते वक्त बेबी को समाज से ताने सुनने पड़ते हैं. शहर के बीचो बीच मार्केट में एक लड़की द्वारा गुप्त रोगों का इलाज करना इस फिल्म को बेहद खास बनाता है. इसके लिए एक बेबाकीपन चाहिए और हौसले भी. जो बेबी में कूट कूट कर भरे हैं. तभी उसे समाज के तानों का कोई असर नहीं होता और वो अपना संघर्ष जारी रखती है. हालांकि इस संघर्ष के दौरान कुछ रोचक मोड़ आते हैं जो आपको फिल्म देखकर पता चलेंगे. हंसी मजाक के पुट के साथ एक जरूरी कहानी पर्दे पर देखना दिलचस्प है.

फिल्म में सभी कलाकारों की एक्टिंग लाजवाब है. सोनाक्षी सिन्हा ने एक बेबाक पंजाबी लड़की का रोल उम्दा रोल निभाया है. उनके अलावा भाई के रोल में वरुण शर्मा, एडवोकेट के रोल में अनू कपूर, मामाजी के रोल में कुलभूषण खरबंदा ने बढ़िया काम किया है. जज के रोल में एक्टर राजेश शर्मा के आते ही एक अलग ही माहौल बन जाता है. उनका कैरेक्टर कम समय का है मगर बेहद यूनिक है. जजों को हमेशा से बेहद गंभीर तरीके से पेश किया जाता रहा है. मगर राजेश ने इस किरदार में रोचकता भर दी.

अब बात फिल्म के आकर्षण की. बादशाह की. सुपरहिट रैप गा चुका ये सिंगर एक्टिंग में भी माहिर है. इस फिल्म में बादशाह ने अहम रोल प्ले किया है. उनके फॉलोअर्स उनकी एक्टिंग को देख कर खुश होंगे. फिल्म में गाने कम हैं और जहां जरूरत है वहीं हैं.

फिल्म के डायलॉग्स ठीक-ठाक हैं. मगर स्क्रिप्ट कहीं ना कहीं अखरती है. फिल्म में वो रफ़्तार नहीं है जो शुरू से लेकर अंत तक बांध कर रखे. बीच में थोड़ी-थोड़ी उबाऊ लगने लगती है. वरुण शर्मा को अगर और अच्छे डायलॉग्स मिलते तो फिल्म का बीच बीच में होनेवाला धीमापन अखरता नहीं.

इस मूवी के जरिए मैसेज तो बहुत अच्छा दिया गया है मगर शायद इसे फिल्माने का अंदाज जरा और अलग होता तो फिल्म जेहन में घर कर लेती. मगर ये बात भी माननी होगी की सोनाक्षी का प्रयास अपनी ओर से 100 प्रतिशत रहा. उनका अभिनय निखर कर सामने आया. फिल्म की लीड एक्टर वहीं थीं और अकेले अपने दम पर फिल्म को लेकर आगे बढ़ना बड़ी बात है. सपोर्टिव रोल्स से भी उन्हें अच्छी हेल्प मिली.

प्रेयांश जोरा के साथ उनकी केमिस्ट्री भले ही मुख्तसर रही, मगर फिल्म की स्क्रिप्ट के हिसाब से प्यार-मोहब्बत के सीन्स के लिए ज्यादा स्पेस भी नहीं था. फिल्म की शूटिंग लोकेशन अच्छी है. पंजाब की खूबसूरती का फील कुछ लोकेशन की शूटिंग में नजर आता है जो आकर्षक है.

फिल्म देखने लायक है और दिखाने लायक भी. खानदानी शफाखाना वास्तव में एक जरूरी कहानी है.