Wednesday, May 18, 2022
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उज्जैन : सरकारी मंदिरों की संपत्तियों से हटेंगे पंडे, पुजारी, पुरोहितों के नाम…

700 से अधिक मंदिरों का राजस्व रिकॉर्ड होगा चेंज

आधिपत्य को लेकर होने वाले विवाद भी खत्म हो जाएंगे…

उज्जैन। सरकारी मंदिरों की अचल संपत्तियों के रिकॉर्ड से पंडे,पुजारी,पुरोहित के नाम हटाएं जाएंगे। इसमें उज्जैन के 84 महादेव सहित 700 से अधिक मंदिर का राजस्व रिकॉर्ड बदला जाएगा। माना जा रहा है कि ऐसा करने से शासकीय मंदिरों की संपत्तियों के आधिपत्य को लेकर होने वाले विवाद भी खत्म हो जाएंगे।

उज्जैन में शासकीय मंदिरों की जमीन और संपत्तियों के रिकॉर्ड में फेरबदल होने वाला है। इसके बाद उज्जैन के 84 महादेव मंदिर के साथ करीब सात सौ छोटे बड़े मंदिरों के खसरे से पंडे, पुजारियों, पुरोहितों के नाम अब हट जाएंगे। दरअसल कई शासकीय मंदिरों में वर्षों से सेवा कर रहे पण्डे-पुजारी-पुरोहित के परिवार मंदिर और मंदिरों की अचल संपत्तियों पर अपना अधिकार जमाने के लिए मामलों को कोर्ट तक ले जाते हैं। मंदिरों का शहर उज्जैन, जहां सैकड़ों बड़े-छोटे मंदिर हैं। इन मंदिरों में से कई बड़े मंदिरों को शासन पहले ही अपने नाम करा चुका है। जिसमें कुछ मंदिर के पास अलग-अलग जमीनें भी हैं। अब एक बार फिर जिला प्रशासन उन मंदिरों के खसरे से पण्डे-पुजारी के नाम हटाने जा रहा है। जिनमें अब तक पुजारी परिवार के नाम ही चढ़े हुए हैं। जिन मंदिरों और उनकी जमीनों पर पुजारियों के नाम चढ़े हुए हैं, जल्द ही उन मंदिरों के खसरे से पुजारियों के नाम हटा कर शासन- प्रशासन का नाम चढ़ाया जाएगा।

देवता ही मंदिर से जुड़ी जमीन के मालिक हैं

बता दें करीब दो माह पहले मंदिर के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंदिरों की संपत्ति को लेकर एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि मंदिर के पुजारी को जमीन का मालिक नहीं माना जा सकता और देवता ही मंदिर से जुड़ी जमीन के मालिक हैं। पुजारी एक किराएदार की तरह काम करता है। वह काश्तकार नहीं होता। जो भी पुजारी होगा वह मंदिर का प्रबंधन करेगा, उसकी देखभाल करेगा। कानून में देवता की मान्यता विधिसम्मत है, इसलिए मंदिर की सम्पत्ति देवता के ही नाम रहेगी। भू-राजस्व के रिकॉर्ड में पुजारियों के नाम जोड़े जाने की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला में कहा है कि एक पुजारी किसी भी मंदिर की जमीन या सम्पत्ति का मालिक नहीं हो सकता। वह सिर्फ एक सेवक की तरह काम करता है। मंदिर की सम्पत्ति का मालिक उसका देवता ही होता है।

बरकरार रखा मध्यप्रदेश का सर्कुलर

मध्य प्रदेश के 1959 के सर्कुलर को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। इसी मामले में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सर्कुलर को बरकरार रखा है। इस सर्कुलर में पुजारियों के नाम भू राजस्व के रिकॉर्ड से हटाने के आदेश दिए गए थे, जिससे मंदिर की सम्पत्ति को अवैध रूप से बेचे जाने से बचा जा सके। उल्लेखनीय है कि उज्जैन जिले के कुछ शासकीय मंदिरों और उनकी संपत्ति को लेकर सरकार और पुजारियों के बीच मामले विवाद में है। ऐसी ही स्थिति अन्य जिलों में भी सामने आने के बाद प्रदेश सरकार ने १९५९ के सर्कुलर को लागू कर दिया था। इस पर कई मंदिरों के पुजारियों ने आपत्तियां भी लगा रखी है तो कुछ न्यायालय की शरण में चले गए थे।

भू-राजस्व से पुजारियों के नाम हटाने के आदेश
जस्टिस हेमंत गुप्ता व एएस बोपन्ना की बेंच ने कहा कि पुजारी के पास मंदिर या मंदिर की सम्पत्ति केवल प्रबंधन के लिए ही होती है। वह सिर्फ देवता की जगह पर उस मंदिर में काम करता है, चूंकि, देवता का नाम कानून में विधि सम्मत है इसलिए भू राजस्व के रिकॉर्ड में देवता के नाम ही मंदिर की सम्पत्ति रखी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ ही भू-राजस्व के रिकॉर्ड से पुजारियों के नाम हटाने के भी आदेश
दिए हैं।

किराएदार जैसा है पुजारी

कोर्ट ने कहा कि पुजारी उस जमीन की सिर्फ देखभाल करता है। वह सिर्फ एक किराएदार जैसा है। जो भी पुजारी होगा। मंदिर की देखरेख और देवताओं की पूजा के साथ उससे जुड़ी जमीन पर खेती का काम भी करेगा।

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