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कालिदास अकादमी संकुल में दर्शकों पर बरसा शृंगार रस

विक्रमोत्सव: छठी शाम में चतुर्भाणी की नाट्य प्रस्तुति

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उज्जैन। विक्रमोत्सव नाट्य समारोह की छठी शाम में शृंगार रस से भरे चतुर्भाणी की प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। चतुर्भाणी गुप्तकालीन संस्कृत साहित्य की चार प्रसिद्ध एकांकी का संग्रह है। इसमें प्राचीन भारत के रसिक और लोक जीवन का चित्रण है। बोलचाल वाली संस्कृत और नाटकीय शैली का यह नाटक प्रेम ,विलास ,हास्य और तत्कालीन नगर जीवन की विसंगतियों को व्यंग्यात्मक (सटायर) रूप में दर्शाता है। जबलपुर के राजकुमार कामले के निर्देशन और महाराज विक्रमादित्य शोधपीठ, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (भारंगम) के संयुक्त तत्वावधान और ‘उभयाभिसारिका’ (वररुचि) एवं ‘पद्यप्राभृतकम’ (शूद्रक) पर आधारित चतुर्भाणी में कर्णीपुत्र- देवदत्ता का प्रेम प्रसंग चित्रित किया गया है। गलतफहमी से दोनों के बीच वियोग हो जाता है और उनके पुनर्मिलन के लिए मित्र यात्रा करता है और रास्ते में लोगों से संवाद करता है।

वसंत ऋतु, प्रकृति सौंदर्य, मणिकाओं का जीवन और तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों के जीवंत चित्रण का अंत कर्णीपुत्र और देवदत्ता के मिलन से होता है। यह क्षण दर्शकों के लिए भावपूर्ण बन गया। वैशिकाचल एवं शश द्वितीय ( विक्की तिवारी) शश प्रथम ( सिद्धार्थ श्रीवास्तव ) कर्णीपुत्र (तरुण सिंह ठाकुर), दत्तकलशी (अश्वनी यादव) विपुलामात्य (आयुष्यमान शर्मा )तथा पवित्रक एवं कवि (साहिल ठाकुर) ने अभिनय से खास छाप छोड़ी।

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भावजरदगव एवं दर्दरक (सत्यम प्रजापति ) देवसेना (राधा बर्मन) और उनकी सखी के रूप में पलक तिवारी ने भी प्रभाव छोड़ा। कथक की प्रस्तुति मुक्ति और हंसिका मिश्रा ने दी। लोकनृत्य में राधा बर्मन, पलक तिवारी, मुक्ति मिश्रा, हंसिका मिश्रा एवं विशाल विश्वकर्मा ने सहभागिता की। मंचन से पूर्व नाट्य निर्देशक का सारस्वत सम्मान सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय कार्य परिषद सदस्य राजेश सिंह कुशवाह,प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक मुकेश जोशी, भाजपा नगर महामंत्री जगदीश पांचाल तथा कमल बैरवा ने किया।

समीक्षा
डॉ जफर महमूद

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