Sunday, May 22, 2022
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भगवान महावीर और उनका जीवन दर्शन

जैन धर्म एवं भगवान महावीर के अनुसार ईश्वर न तो जगत का निर्माता है और न ही किसी को लाभ-हानि, सुख-दु:ख आदि पहुंचाने से ही उसका कोई सम्बन्ध है…

जैन आचार संहिता की एक और विशेषता है संयम

दिनेश गोधा/ जैन धर्म एवं भगवान महावीर के अनुसार ईश्वर न तो जगत का निर्माता है और न ही किसी को लाभ – हानि , सुख – दु:ख आदि पहुँचाने से ही उसका कोई सम्बन्ध है।

वह सिर्फ एक आध्यात्मिक आदर्श नहीं अपितु वह परमात्मा है जिन्होंने अपनी आत्मा के शुद्ध स्वरूप को प्राप्त कर लिया है , ऐसी शुद्ध आत्मा जो जन्म – मरण रूपी संसार चक्र से मुक्त हो चुकी है उन्हीं परमात्माओं को परम इष्ट मानकर पूजा जाता है ।

उनकी पूजा या गुणानुवाद भी उन जैसे गुणों की प्राप्ति के उद्देश्य से ही की जाती है, ताकि उन गुणों को अपनी जीवनचर्या में उतारकर तदनुरूप निज शुद्धात्म स्वरूप को प्राप्त कर सके। भगवान महावीर ने नर से नारायण बनने का मार्ग अपनाया था और वही मार्ग जो भक्त से भगवान बनने का मार्ग है जगत को बतलाया है।

भगवान महावीर या जैन दर्शनानुसार प्रत्येक आत्मा स्वयं ही अपने भविष्य या भाग्य का निर्माता है, अत: उसे अपने शुभ – अशुभ , भले – बुरे सभी कर्मों का फल भोगना ही होता है। यानी कि जीवन का आधार स्व सम्पादित कर्म ही है कोई अन्य नहीं। किसी भी जीव द्वारा अर्जित पाप – पुण्य का आदान – प्रदान सर्वथा असंभव है। प्रत्येक द्रव्य ( जीव, अजीव आदि) स्व द्रव्य – क्षेत्र – काल – भाव रूपी स्वचतुष्टय में ही कार्यकारी होता है इस सिद्धांत के अनुसार आत्मा किसी भी बाहृय पदार्थ का कर्ता नही होता है और न ही कोई अन्य पदार्थ या जीव उसका कर्ता हो सकता है।

जीव ऐसी किसी भी बाहृय शक्ति पर आश्रित नहीं है जिसे ईश्वरीय या दैवीय कहा जा सके। अत: यह सिद्धान्त मनुष्य को आत्मनिर्भर होकर स्व कल्याण हेतु पुरूषार्थ करने की प्रेरणा प्रदान करता है। जीवन का मूलाधार जीव या आत्मतत्व है जो जड़ पदार्थों से भिन्न है। अनादिकाल से जीव का चतुर्गति ( देव, नारकी, मनुष्य, तिर्यंच ) भ्रमण कर्म संयोग से है, जड़ एवँ चेतन के सम्बन्धों का परिणाम है और यही कर्मजन्य सम्बन्ध संसार

संतति एवं सांसारिक सुख – दु:ख का कारण है। जैन धर्म का उद्देश्य चेतन को जड़ के बन्धन से मुक्त करना है, ताकि जीव अपने सहज शुद्ध स्वरूप को प्राप्त कर अपने स्वभाविक निजानन्द को प्राप्त हो सके।

हिंसा, झूंठ, चोरी, कुशील, परिग्रह जैसे दुर्गुणी दुराचरण को त्याज्य मानने वाले जैन जीवन – दर्शन का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है ‘अहिंसा’ जिसका तात्पर्य है – समस्त जीव जगत के प्रति यथासंभव उदारता – मैत्रीभाव का पालन करें उसकी रक्षा करें । समस्त जड़ एवँ चेतन पदार्थो के प्रति समता का भाव रखें। जैन दर्शन के अनुसार संसार में दो प्रकार के जीव त्रस (चलायमान ) एवँ स्थावर ( अचल ) होते हैं।

महावीर की दृष्टि से त्रस या स्थावर जीवों को कष्ट देना या उनका अपव्यय करना या उनका वध करना हिंसा है। स्थावर जैसे कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति तथा त्रस जीवों में जीवन है जिसे वैज्ञानिक रूप में भी स्वीकार किया गया है, ये जीव हैं । जैन दर्शन में त्रस जीवों में भी उन्हें प्राप्त इन्द्रियों के अनुसार श्रेणियां निर्धारित की है, जैसे शंख, चींटी, पशु एवँ मनुष्यादि प्राणी क्रमश: दो, तीन, चार और पांच इन्द्रिय जीव हैं। इनके अतिरिक्त जो अचल जीव हैं वे एक इन्द्रिय हैं।

भारतीय संस्कृति में अहिंसा एवँ सहिष्णुता का सिद्धांत जैन दर्शन की महान देन हैं। वर्तमान जगत में व्याप्त जातिवाद, क्षैत्रवाद, कट्टरता, सत्तालोलुपता एवँ अधिकारवाद की दुष्पृवर्तीयों के चलते क्षत – विक्षत होती मानवता की रक्षा एवँ हिंसादि से त्रस्त अशांत विश्व में शान्ति एवँ सौहार्द की स्थापना मात्र महावीर की अहिंसा एवँ उनके दिव्य संदेश ‘ जीयो और जीने दो’ के अनुपालन से ही संभव है।

इन्द्रिय सुख की लालसाओं एवँ सम्पत्ति के अधिग्रहण ( परिग्रह ) पर दृढ़ता के साथ उत्तरोत्तर संयम रखना। एक आदर्श धर्मात्मा व्यक्ति मन – वचन और कर्म से सभी लिप्साओं से अपने को पूरी तरह दूर रखता है। उसकी अंतिम सांसारिक सम्पत्ति मात्र उसकी देह रह जाती है, आत्मकल्याण हेतु जिसकी रक्षा के लिए जरूरी आवश्यकताओं को भी संभवत: वह उस समय पूरी तरह त्याग देता है जब यह देह भी सत्यज्ञान से साक्षात्कार करने में सहायक नहीं रह जाती।

सम्यग्दर्शन – ज्ञान – चारित्राणि मोक्षमार्ग : जीव की सुख… दु:खात्मक सांसारिक अवस्था को समझने और उसकी ग्रन्थि को सुलझाकर आत्म – तत्त्व के शुद्ध – बुद्ध – मुक्त स्वरूप के प्रकाशन हेतु सात तत्वों को समझने की आवश्यकता है। जीव और अजीव (जड़ तत्व ) सृष्टि के मूल तत्व ही हैं ।

जीव – अजीव ( उदयाधीन कर्म ) का परस्पर संयोग होना ही आस्रव है , कर्म – बन्ध है। इस सम्पर्क या आस्रव से ऐसे बंध का सृजन होना जिससे आत्मा का शुद्ध स्वरूप ढक जाए और उसके ज्ञान – दर्शनात्मक गुण कुंठित हो जाये, उसे बंध या कर्म – बंध कहते हैं।

जिन संयमरूप क्रियाओं व साधनाओं द्वारा इस जीव व अजीव के सम्पर्क को रोका जाता है, उसे संवर कहते हैं तथा जिन व्रत और तपरूप क्रियाओं द्वारा संचित कर्म – बन्ध को जर्जरित और विनिष्ट किया जाता है उसे निर्जरा कहते हैं। मोक्ष – जीवन का उच्चतम आदर्श लक्ष्य व कर्मभार रहित शुद्धात्मा प्राप्ति हैं।

सम्यग्दर्शन – ज्ञान – चारित्र रूपी केवल ज्ञान में इसी समस्त बोध – प्रबोध का पुर्णत: व्यापक व शूक्ष्मतम स्वरूप समाविष्ट है। जब यह कर्म – निर्जरा की प्रक्रिया पूर्ण रूप से सम्पन्न हो जाती है, तब जीव अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त कर लेता है, नारायण हो जाता है ।आत्मा की सर्वोच्च श्रेष्ठतम सत्ता एवँ ऊर्जा प्रकट हो जाती है वह जीवन – मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है, उसका निर्वाण हो जाता है। नर से नारायण बनने का मार्ग बताने वाला यह दर्शन ही महावीर का जीवन दर्शन है ।

महावीर वाणी…क्षमा (क्रोध का परिहार एवं सहनशीलता), मार्दव (अहंकार अभिमान की निवृत्ति), आर्जव (माया का विनाश), शौच (पवित्रता अर्थात लोभ का परित्याग) सत्य (असत्य का त्याग), संयम (मन और इंद्रियों को वश में करना एवं हिंसादि पांचों पापों से विरक्त होना), ब्रह्मचर्य (वासना पर विजय प्राप्त करना), तप (इच्छाओं का निरोध करना), त्याग (परपदार्थों से सम्पर्क छोडऩा तथा आहार, औषध, ज्ञान और अभय का दान देना), आकिवन्य (अभ्यंतर विकार-काम, क्रोधादि और धन-धान्य आदि सभी बाह्य परिग्रह का छोडऩा) ये सब धर्म कहलाते हैं।

महावीर स्वामी के 5 सिद्धांत

1. अहिंसा -जीवन का पहला मौलिक तरीका अहिंसा है जैसा कि भगवान महावीर ने कहा, अहिंसा परमो धर्म। यह सिद्धांत दर्शाता है कि हमें किसी भी परिस्थिति में हिंसा से दूर रहना चाहियें।

2. सत्य-दूसरा सिद्धांत है सत्य। भगवान महावीर कहते हैं हे मनुष्य! तू सत्य को ही सच्चा तत्व समझ ! जो बुद्धिमान सत्य के सानिध्य में रहता है, वह मृत्यु को तैरकर पार कर जाता है।

3. अस्तेय- इस सिद्धांत में भगवान महावीर ने मनुष्य को हमेशा धैर्य से काम लेना बताया है।

4. ब्रह्मचर्य – भगवान महावीर का चौथा सिद्धांत है ब्रह्मचर्य। जिसके अंतर्गत वो कामुक गतिविधियों में भाग नहीं लेते हैं। ब्रह्राचर्य का पालन करने से मन की पवित्रता बनी रहती है। 5. अपरिग्रह – पांचवा और अंतिम सिद्धांत है अपरिग्रह। यह सिद्धांत पिछले सभी सिद्धांतों को जोड़ता है।

भगवान महावीर के प्रमुख ग्यारह गणधर-श्री इंद्र्भूती जी, श्री अग्निभूति जी, श्री वायुभूति जी, श्री व्यक्त स्वामीजी, श्री सुधर्मा स्वामीजी, श्री मंडितपुत्रजी, श्री मौर्यपुत्र जी, श्री अकम्पित जी. श्री अचलभ्राता जी, श्री मोतार्यजी, श्री प्रभासजी

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