Tuesday, May 17, 2022
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यूक्रेन की रोमानिया बार्डर पर अटके UJJAIN सहित भारत के बच्चे

उज्जैन की बेटी रोते हुए बोली: अंकल…प्लीज कुछ करो…शिवराज मामा से बोलो…घर की याद आ रही है…अब तो हम मर ही जाएंगे…!

रोमानिया बार्डर से लाइव: मोबाइल की बेटरियां खत्म हो रही, बस वाला 10 किमी दूर छोड़कर चला गया

ललित ज्वेल. उज्जैन यूक्रेन की घड़ी हमारे समय से साढ़े 3 घंटे आगे चलती है। लेकिन वहां घड़ी की सुई इस समय युद्ध के कारण रूक सी गई है। वहां घड़ी की सुई की टिक-टिक करती आवाज भले ही बम के धमाकों में दब गई लेकिन भारत के बच्चे जो रोमानिया की बॉर्डर पर मायनस 5 डिसे में बीती रात से खुली सड़क पर बार्डर खुलने का इंतजार कर रहे हैं,उनके दिल की धड़कन लगातार बढ़ती जा रही है।

वे यूक्रेन की एंबेसी से लगातार गुहार लगा रहे हैं कि आप में से कोई तो आ जाओ,ताकि हमें रोमानिया में प्रवेश मिल सके? उनकी सुननेवाला कोई नहीं है।

वीडियो कॉल पर उज्जैन की मेघा त्रिवेदी ने अक्षरविश्व से रोते हुए कहा -अंकल प्लीज आप मीडिया के माध्यम से यह बात मुख्यमंत्री जी तक पहुंचवाओ। शिवराज मामा से कहो-हम अब तो मर ही जाएंगे। हमारे मोबाइल की बेटरियां खत्म हो रही है।

यहां मायनस 5 डिग्री तापमान है। हम कल रात को 12 बजे (यूके्रन के समय के अनुसार) रोमानिया बार्डर से 10 किलोमीटर दूर पहुंच गए थे। बस वाला यहीं छोड़ गया। कड़ाके की ठंड में अपना जरूरी समान लिए हम बार्डर तक आए हैं। यहां भारत के करीब 5 हजार बच्चे हैं।

पोलेंड बार्डर के बच्चों को भी यहां भेजा जा रहा है। हमारे पहले सैकड़ों लोग कतार में लगे हैं। हमारे मोबाइल की बेटरियां समाप्त हो रही है। हो सकता है, अब हमारा सम्पर्क आप लोगों से, हमारे परिवार से न हो पाए। ऐसे में हमारा क्या होगा? आप बाबा महाकाल से प्रार्थना करो, वे हमारी मदद करे। हमारी यहां कोई नहीं सुन रहा है।

यूक्रेन की इंडियन एम्बेसी हमारे फोन नहीं उठा रही है। हमारे पास अब दोपहर के खाने का सामान और पानी बचा है। यहां कुछ नहीं मिल रहा है। अब तो मन डर रहा है कि हम भारत आ पाएंगे भी या नहीं ?

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घबरा मत बेटा…बाबा महाकाल सब ठीक करेगा

इधर आंसुओं को पलकों के नीचे छिपाते हुए मेघा के पिता मुकेश त्रिवेदी बोले- घबरा मत बेटा, बाबा महाकाल सब ठीक करेगा। वह सबकी चिंता करते हैं, तुम्हारी भी करेंगे। हमने जब पिता मुकेश के कांधे पर हाथ रखा तो रो पड़े, बोले- अभी एक माह पूर्व बड़ी बेटी को बिदा किया। उस समय भी हाथ नहीं कांपे थे।

सिर्फ इसलिए कि वह हमारे आसपास ही है वह। छोटी बेटी आई थी शादी में। खूब इंजाय किया। अभी वह इतनी दूर है कि न तो हम वहां जा सकते और न ही भारत सरकार की एम्बेसी के लोग वहां पहुंच रहे हैं। बाबा महाकाल का ही सहारा बचा है अब। मेघा की मां की स्थिति यह है कि वह बोल भी नहीं पा रही है। रो-रोकर सूजी आंखों से झांकती आशा के साथ वह पूछती है- भैया, सब कुछ ठीक हो जाएगा न? जिस पर हम निरूत्तर हो जाते हैं।

अब आक्रोश पनप रहा है भारतीय बच्चों में
चर्चा करते हुए मौके पर उपस्थित एक भारतीय बच्चे ने कहा- हमारे साथ करीब 5 हजार बच्चे यहां पर है। लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही है। हमारे पास ओढऩे का सामान भी सीमित ही है। तापमान और नीचे जा सकता है।

यहां हम लावारिस से पड़े हैं। उक्त युवक ने अपने मोबाइल को घुमाते हुए पूरे एरिये का नजारा दिखाया। भारतीय बच्चे यहां वहां हताश बैठे थे। अब कुछ बच्चों में एंबेसी की संवादहीनता को लेकर आक्रोश उपज रहा था। उन्हे जो नम्बर उपलब्ध करवाए गए थे, वे दिखावे के साबित हो रहे हैं। आगे क्या होगा, पता नहीं?

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