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चीनी मांझे से निपटने की पुख्ता हो तैयारी…

सिस्टम में प्रशासन और पुलिस की तैयारी अकसर घटना के बाद की होती है। जैसे दूषित भोजन से बीमार होने के बाद कार्रवाई या फिर हादसा होने पर रोकथाम के उपायों का आडिट। ऐसा ही एक मामला चीनी मांझे की बिक्री का है। मकर संक्रांति नजदीक है। उत्साही लोग पतंग और मांझे की व्यवस्था में जुटे हैं। चीनी मांझों की वजह से बीते वर्षों में कई हादसे हो चुके हैं। शहर में मांझे से एक छात्रा की गर्दन कटने से मौत हो चुकी है। बाकी दुर्घटनाओं की संख्या तो अनगिनत है। ऐसे दर्दनाक हादसे प्रशासन को सतर्क करने के लिए काफी हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रशासन इनकी बिक्री रोकने के पुख्ता इंतजाम कर चुका होगा ताकि बाद में उसे लाठी पीटने की आवश्यकता न पड़े।

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विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण फॉर्मूले से टेंशन में सांसद

 

प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट वितरण के फॉर्मूले से सत्ताधारी दल के कई सांसद टेंशन में हैं। पार्टी ने केंद्र की राजनीति में लंबे समय से काबिज बड़े नेताओं को राज्य में वापस भेज दिया था। इन नेताओं की लोकसभा सीटों पर नए चेहरे खोजे जा रहे हैं, लेकिन इससे ज्यादा चिंतित मौजूदा सांसद हैं। उन्हें इस बात का डर है कि कहीं उनका टिकट ना कट जाए।

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जाम की अस्थायी समस्या भी चुनौती है

शहर में ट्रैफिक जाम की समस्या कई तरह की है। चौराहों पर व्यस्त समय में जाम लगता है। पुराने बाजारों में त्योहार पर जाम की स्थिति गंभीर होती है। कई धार्मिक स्थलों के आसपास भी वाहनों के अतिक्रमण के कारण जाम लगता है। नाश्ते की दुकान,रेस्टोरेंट के सामने वाली सड़कों पर इस तरह का नजारा देखा जा सकता है। सबका इलाज अलग-अलग है। संसाधनों का रोना रोने वाली पुलिस अस्थायी या कुछ घंटों के जाम वाली समस्या का निदान तो मामूली प्रयासों से कर सकती है। लोगों की जवाबदारी भी इस समस्या से मुक्ति दिला सकती है। जहां भी लोग जा रहे हैं, उसके गेट के ठीक सामने गाड़ी खड़ी करना आवश्यक कतई नहीं है। थोड़ा पैदल चलना भी जरूरी है। यकीन मानिए, थोड़ी सी यह दूरी अन्य लोगों की गति को बढ़ा सकती है।

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कुछ तो है जो अफसरी मिटती नहीं इनकी

प्रशासनिक अधिकारी अकसर आपा खोते रहते हैं। एक तो अफसर बनने के बाद उनके डीएनए में सर्वश्रेष्ठ होने का भ्रम शामिल हो जाता है। इसके बाद अपने अधीनस्थों से इतना कथित सम्मान मिलता है कि यह भ्रम टूटता ही नहीं। वैसे भी प्रशासनिक अधिकारियों का जनता से सीधा संवाद खत्म होता जा रहा है। जब आदत नहीं रहेगी तो गड़बड़ी होने की गुंजाइश बढ़ भी जाएगी। यह अलग बात है कि राज्य सरकार की ओर से बार-बार कहा जाता है कि अधिकारी गांवों में जाएं, लोगों से मिलें, समस्याओं को समझें। शाजापुर के हटाए गए कलेक्टर किशोर कन्याल इसका ताजा उदाहरण बन गए हैं। बात यह भी है कि औपचारिक बैठकों में मीडिया के कैमरे होते नहीं और डांट खाने वाले उनसे अधिकार और पद में छोटे होते हैं इसलिए सामने से सवाल की आदत भी नहीं होती। ऐसा बहुत कुछ है इसीलिए अफसरी हटने का नाम नहीं लेती।

शैलेष व्यास

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